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Chapter 1

Kala Moti - Episode 1

Kala Moti

सप्तशक्ति - ब्रह्मां ड के नि र्मा ण के लि ये ईश्वर ने पहले सप्तशक्ति यों का

नि र्मा ण कि या । ये सप्तशक्ति यां थीं - वा यु, जल, अग्नि , पृथ्वी , आका श,

ध्वनि और प्रका श। इन सभी सप्तशक्ति यों ने मि लकर ब्रह्मां ड में उपस्थि त

सभी ग्रहों की रचना की । परंतु अभी भी जी वन की उत्पत्ति संभव नहीं हो

सकी थी । जी वन की उत्पत्ति के लि ये ब्रह्मदेव ने एक कण की रचना की ,

जि से बा द में ब्रह्मकण के ना म से जा ना गया । इस ब्रह्मकण में जी वन की

उत्पत्ति के अला वा इन सभी सप्तशक्ति यों को नि यंत्रि त करने की शक्ति भी

थी ।

ब्रह्मां ड की रचना के बा द ब्रह्मदेव ने इस ब्रह्मकण को एक का ले मो ती

में समा हि त कर समुद्र की अथा ह गहरा इयों में कहीं छि पा दि या । परंतु एक

दि न एक नी ली जलपरी की गलती से ‘का ला मो ती ’ ग्री क देवता पो सा इडन

के हा थ लग गया । इसके बा द शुरु हुई रहस्य व रो मां च से भरी ऐसी

कहा नी , जि सने पृथ्वी ही नहीं वरन् ब्रह्मां ड के कई ग्रहों को अपनी चपेट में

ले लि या ।

फि र शुरु हुई एक ऐसी प्रश्ना वली जि सने सभी के मस्ति ष्क को पूरी

तरह से झकझो र कर रख दि या -

1) क्या हुआ जब ब्रह्मदेव का जन्म सहस्त्रदल कमल पर हुआ? क्या

ब्रह्मदेव अपने जन्म के रहस्य को समझ सके?

2) क्या हुआ जब ब्रह्मकण से जन्मी ला वण्या , अरि गंधा के

रा जकुमा र मेघवर्ण को लेकर अथा ह समुद्र की गहरा इयों में चली गई?

3) क्या नी ला भ महा देव की शक्ति यों को प्रा प्त करने के लि ये, का शी

जा कर का लभैरव से आशी र्वा द प्रा प्त कर सका ?

4) क्या हुआ जब समयचक्र ने भवि ष्य को बदलना शुरु कर दि या ?

5) क्या हुआ जब ति लि स्मा में घूम रही 12 रा शि यों ने अलग-अलग

प्रका र से ति लि स्मा में प्रवेश कि ये लो गों पर आक्रमण कर दि या ?

6) क्या था काँ च की ति तली का रहस्य, जो लो गों का अपहरण कर

उनका रुप धर लेती थी ?

7) क्या हुआ जब व्यो म का युद्ध यमदेव व महा का ली से हुआ?

8) क्या सुयश व शैफा ली कैला श पर्वत पर लि पटी महा देव की जटा ओं को खो लकर मा या जा ल को पा र कर सके?

9) क्या था भगवा न श्री रा म की बा लरुप वा ली मूर्ति का रहस्य, जि से

लेने के लि ये नी ला भ को गरुणा क्ष पर्वत पर जा ना पड़ा ?

10) क्या था ब्लैकून के अंदर छि पे फी नी क्स पक्षी का रहस्य?

11) क्या था न्यूया र्क शहर में स्थि त ‘एटर्नल फ्लेम’ का रहस्य, जो

झरने के नी चे भी सदि यों से जल रही थी ?

12) क्या था सी री नि या के जंगलों में छि पे ‘नि म्फि या महल’ का

रहस्य, जि से देवी आर्टेमि स ने अपनी सबसे प्रि य सुनहरी हि रनी के लि ये

बना या था ?

13) क्या क्रि स्टी रो म के पौ रा णि क शहर ‘ट्रॉ य’ के ति लि स्म को पा र

कर सकी ?

तो दो स्तों इन सभी प्रश्नों के उत्तर को जा नने के लि ये आइये पढ़ते हैं,

ब्रह्मदेव के जन्म से शुरु हुई एक ऐसी महा गा था , जि सने मनुष्य ही नहीं

अपि तु ईश्वर को भी हि ला कर रख दि या । जि सका ना म ह

सतयुग, क्षी र सा गर

रसा गर का दुग्ध के समा न श्वेत जल, सा गर की सतह पर हि लो रें

मा र रहा था । दूर-दूर तक लहरों की हलचल और उसकी तेज ध्वनि के

सि वा कुछ भी सुना ई नहीं दे रहा था ।

नी ला आसमा न अपनी छा या को , क्षी र सा गर के श्वेत जल में नि हा र

कर मुग्ध हो रहा था ।

तभी वा ता वरण में एक सुनहरा दि व्य प्रका श उत्पन्न हुआ, जो कि

नी ले आसमा न से नि कलकर, क्षी र सा गर के श्वेत जल को , एक स्था न पर

स्पर्श करने लगा ।

दि व्य प्रका श का श्वेत जल के स्पर्श करते ही , उस श्वेत जल के मध्य

से, एक गुला बी रंग की आकृति ने उभरना शुरु कर दि या ।

कुछ ही देर में देखते ही देखते, वह गुला बी आकृति पूर्ण रुप से, श्वेत

जल की सतह पर आ गई।

अब उस गुला बी आकृति ने, एक वि शा ल दि व्य कमल के पुष्प का

आका र ले लि या , पर यह पुष्प अभी खि ला नहीं था । यह तो मा त्र एक

पवि त्र कली थी , जो कि सी अद्भुतद्भु शक्ति के दि व्य प्रका श से जन्म ले रही

थी ।

कली के प्रकट हो ते ही , श्वेत जल हवा में तेज हि लो रें मा रने लगा ।

श्वेत जल कमल की उस कली को उछलकर, इस प्रका र स्पर्श कर

रहा था , मा नों वह दुग्ध जल, उस पवि त्र कली के पैर पखा र रहा हो ।

तभी वा ता वरण में ‘ऊँ’ की एक ध्वनि उत्पन्न हुई, जो कि कुछ ही

पलों में सम्पूर्ण सृष्टि में फैल गई। यह ध्वनि नि रंतर वा ता वरण में एक मधुर रस घो ल रही थी ।

लगा ता र ‘ऊँ’ के स्पंदन से, कमल की कली ने कुनमुना कर अपनी

आँखें खो लना शुरु कर दि या । एक-एक कर कली की पंखुड़ि यां खुलती जा

रहीं थीं ।

कुछ ही देर में इस सहस्त्रदल कमल की एक हजा र पंखुड़ि यों ने,

अपनी नि द्रा भंग कर, इस अपूर्ण सृष्टि के दर्शन कि ये।

सभी पंखुड़ि यों के खुल जा ने के बा द, उस सहस्त्रदल कमल पर एक

दि व्य पुरुष लेटे हुए दि खा ई दि ये, जि नकी पलकें अभी वि श्रा म की अवस्था

में थीं ।

प्रका श की कि रणें अभी भी प्रस्फुटि त हो कर, पवि त्र कमल को स्पर्श

कर रही थीं । उधर ‘ऊँ’ का नि ना द भी अपने चरम पर था ।

तभी क्षी र सा गर की कुछ बूंदों ने, हवा ओं के झूले पर बैठ, उस दि व्य

पुरुष की पलकों का एक चुम्बन लि या ।

अब उस दि व्य पुरुष ने अपने नेत्रों को खो ल दि या ।

कुछ क्षणों तक सृष्टि का अवलो कन करने के बा द, उन्हों ने अपने

सी प के समा न अधरों को खो ला - “मैं कौ न हूं? मेरा जन्म क्यों हुआ? यह

कौ न सा स्था न है?”

तभी कमल पर पड़ रहा दि व्य प्रका श कुछ कम हुआ और उससे एक

ध्वनि वा ता वरण में गुंजा यमा न हुई- “मैं नि रा का र परम ब्रह्म हूं, मैंने ही तुम्हें

इस सृष्टि की रचना को पूर्ण करने के लि ये अवतरि त कि या है।”

“हे परम ब्रह्म, तो कृपा करके मेरा ना मकरण करते हुए मेरा

मा र्गदर्शन की जि ये।” दि व्य पुरुष ने अपने दो नों हा थ जो ड़ते हुए कहा ।

“तुम्हा रा अवतरण ब्रह्मज्ञा न को अर्जि त कर, सृष्टि को पूर्ण करने के

लि ये हुआ है, इसलि ये आज से तुम्हा रा ना म ब्रह्मदेव हो गा । आज से समस्त

संसा र तुम्हें ब्रह्मदेव, सृष्टि कर्ता , ब्रह्मा आदि ना मों से जा नेगा । पर इस

ना मकरण को चरि ता र्थ करने के लि ये, तुम्हें पहले ब्रह्मज्ञा न लेना हो गा ।”

परम ब्रह्म ने कहा - “उस ब्रह्मज्ञा न के बि ना , तुम्हा री उत्पत्ति अर्थरहि त है।”

“तो फि र मुझे उस ब्रह्मज्ञा न का श्रवण करा इये परम ब्रह्म।” ब्रह्मदेव

ने कहा - “मैं उस ब्रह्मज्ञा न को पा ने के लि ये व्यग्र हूं।”

“वह ब्रह्मज्ञा न तुम्हें स्वयं से प्रा प्त करना हो गा ब्रह्मदेव। इसलि ये

अभी से तुम उस ब्रह्मज्ञा न को तला शना शुरु कर दो । जि स क्षण तुम्हें उस

ब्रह्मज्ञा न के दर्शन हो जा येंगे, तुम मेरी वा णी को फि र से सुन पा ओगे।” यह

कहकर परम ब्रह्म का दि व्य प्रका श और वा णी कहीं वा ता वरण में लुप्त हो

गई?

अब ‘ऊँ’ की प्रति ध्वनि भी वा युमण्डल में वि ली न हो गई।

“पर परम ब्रह्म .... मुझे तो यह भी नहीं पता कि मुझे ब्रह्मज्ञा न कहां

से और कैसे प्रा प्त हो गा ?” ब्रह्मदेव ने परम ब्रह्म से कहा ।

पर अब कुछ भी कहना व्यर्थ था , परम ब्रह्म वहां से जा चुके थे।

कुछ देर की प्रती क्षा के बा द ब्रह्मदेव समझ गये कि अब उन्हें स्वयं ही

ब्रह्मज्ञा न के रहस्य को तला शना हो गा ।

अतः वह कमल के पुष्प की सभी पंखुड़ि यों को नि हा रने लगे। सभी

पंखुड़ि यां आका र में छो टी -बड़ी थीं ।

“यह सभी पंखुड़ि यां छो टी -बड़ी क्यों हैं? अर्था त् प्रकृति में सबकुछ

एक समा न नहीं हो ता । ....... यह श्वेत जल, नी ल गगन, पा टल (गुला बी )

पंखुड़ि यां , हरि त दलपत्र ... सबकुछ भि न्न-भि न्न रंगों से बना है ..... वा यु,

जल, गगन, प्रका श, ध्वनि ... यह सब प्रकृति में वि द्यमा न हैं ... पर इनका

नि यंत्रण कौ न करता है? .... लगता है मुझे इन सब ची जों के बा रे में जा नने

से पहले, अपनी उत्पत्ति के का रक के बा रे में जा नना हो गा ?”

ऐसे अनेकों नेक प्रश्न थे, जो ब्रह्मदेव के मस्ति ष्क को उलझा रहे थे।

आखि रका र बहुत सो चने के बा द ब्रह्मदेव, उस सहस्त्रदल कमल की डंठल

में प्रवेश कर गये।

ब्रह्मदेव जैसे-जैसे डंठल में आगे बढ़ रहे थे, वैसे-वैसे डंठल का

आका र चौ ड़ा हो ता जा रहा था ।

ब्रह्मदेव को उस डंठल में चलते हुए कई घंटे बी त गये। आखि रका र

ब्रह्मदेव उस डंठल के उद्गम स्थल तक पहुंच ही गये।

वह डंठल एक ब्रह्मां ड रुपी वि शा ल वृक्ष की बेल से नि कला था ।

इस वि शा ल वृक्ष की 7 शा खा एं थीं और हर एक शा खा में पत्ति यों के

स्था न पर करो ड़ों ग्रह वि चरण कर रहे थे।

उस वि शा ल ब्रह्मां डी य वृक्ष के आगे, ब्रह्मदेव को अपना शरी र, एक कण के समा न प्रती त हो रहा था ।

“मैं तो यहां पर एक सा धा रण से पुष्प की उत्पत्ति के बा रे में जा नने

के लि ये आया था , पर अब तो यहां मुझे वि शा ल ब्रह्मांडी य वृक्ष दि ख रहा है

.... जो कि एक धरा पर लगा है। या नि कि अब मुझे इस ब्रह्मांडी य वृक्ष की

जड़ में जा ना हो गा .... वहीं से मुझे इस वृक्ष के स्रो त पता चल सकता है।”

यह सो च ब्रह्मदेव ने धरा के कणों को टटो लकर देखा और फि र स्वयं

उस ब्रह्मां डी य वृक्ष की जड़ों में प्रवेश कर गये।

ब्रह्मदेव वृक्ष की जड़ों को पकड़े हुए धरा के अंदर चले जा रहे थे।

कुछ समय के बा द वृक्ष की वह जड़ें ब्रह्मदेव को लेकर, धरा के अंदर स्थि त

एक सुरंग में पहुंच गईं।

वह पूरी सुरंग भूरे रंग की चट्टा नों से नि र्मि त थी । अब ब्रह्मदेव ने उस

सुरंग की या त्रा शुरु कर दी ।

लगभग एक घंटे तक अनवरत् चलने के बा द, वह सुरंग एक वि शा ल

मैदा न में नि कली , जहां पर एक वर्गा का र सफेद पत्थर की बड़ी सी चट्टा न

रखी थी ।

उस चट्टा न में एक द्वा र बना हुआ था ।

चट्टा न में द्वा र देख, ब्रह्मदेव उस द्वा र में प्रवेश कर गये। वह द्वा र

ब्रह्मदेव को एक वर्गा का र कमरे में ले आया , जि सके बी च में एक सफेद

पत्थर की चौ की पर, एक वि लक्षण बा लक पा लथी मा रकर आसन की मुद्रा

में बैठा था ।

बा लक की आयु 6 वर्ष के आसपा स प्रती त हो रही थी ।

पूरा कमरा बि ल्कुल श्वेत नजर आ रहा था । यहां तक कि उस बा लक

ने भी श्वेत वस्त्र ही धा रण कर रखे थे।

उस बा लक ने अपने सि र के घनेरे बा लों से, कि सी ऋषि की भां ति

अपने सि र पर एक छो टा सा जूड़ा बना रखा था । उस बा लक के चेहरे पर

दि व्यता वि द्यमा न थी , जि सका ओज उसके चेहरे के चा रो ओर, एक

गो ला का र आकृति में प्रस्फुटि त हो रहा था ।

वह बा लक इस समय ध्या न की मुद्रा में था , इसलि ये ब्रह्मदेव उस

बा लक के सा मने जा कर बैठ गये और अपने नेत्रों से उस दि व्य बा लक की मनो हा री छवि को नि हा रने लगे।

कुछ क्षणों के बा द उस दि व्य बा लक ने अपनी आँखें खो ल दीं और

ब्रह्मदेव की ओर उत्सुकता से देखने लगा ।

“मेरा ना म ब्रह्मदेव है।” ब्रह्मदेव ने उस वि लक्षण बा लक के सम्मुख

हा थ जो ड़कर कहा - “मैं यहां ब्रह्मज्ञा न की तला श में आया हूं। आप कौ न हैं

दि व्य बा लक? कृपया मुझे अपने बा रे में बता एं।”

“मेरा ना म ना रा यण है, परंतु मुझे स्वयं नहीं पता कि मैं कौ न हूं?”

ना रा यण ने कहा - “और मैं कि तने समय से यहां पर हूं? तो फि र मैं आपको

ब्रह्मज्ञा न कैसे दे सकता हूं? परंतु आप चा हें तो पूर्व दि शा से इसके बा रे में

पूछ सकते हैं।”

यह कहकर ना रा यण ने पूर्व दि शा की ओर इशा रा कि या ।

ना रा यण का इशा रा देख, ब्रह्मदेव ने अपने सि र को पूर्व दि शा की

ओर घुमा ने की चेष्टा की , परंतु वह असफल रहे।

“मैं अपना शी श पूर्व दि शा की ओर क्यों नहीं घुमा पा रहा ?” ब्रह्मदेव

के चेहरे पर उलझन के भा व उभरे।

“अगर आप इतना छो टा सा का र्य नहीं कर पा रहे हैं, तो आप

ब्रह्मज्ञा न को कैसे तला श कर पा येंगे ब्रह्मदेव?” ना रा यण ने कहा ।

नन्हे बा लक के कटा क्ष सुन ब्रह्मदेव ने अपनी पूरी शक्ति लगा कर,

अपने शी श को पूर्व दि शा की ओर घुमा या ।

ब्रह्मदेव के अति कठो र प्रया स से, ब्रह्मदेव का सि र तो पूर्व दि शा में

नहीं घूमा , परंतु पूर्व दि शा की ओर उनका एक सि र और उत्पन्न हो गया ।

अब ब्रह्मदेव के 2 सि र हो गये।

“यह मेरे 2 शी श कैसे हो गये?” ब्रह्मदेव ने आश्चर्य व्यक्त करते हुए

कहा ।

“हमें तो नहीं पता ... पर हमें लगता है कि आपको ब्रह्मज्ञा न प्रा प्त

हो ने लगा है।” ना रा यण ने मुस्कुरा ते हुए कहा ।

अब ब्रह्मदेव को पूर्व दि शा में जलती हुई अग्नि दि खा ई देने लगी थी ।

अब ना रा यण, ब्रह्मदेव से बि ना कुछ बो ले, पश्चि म दि शा की ओर

देखने लगे। उन्हें इस प्रका र पश्चि म दि शा की ओर देखते पा कर, ब्रह्मदेव ने अपने सि र पश्चि म दि शा की ओर घुमा या ।

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