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Chapter 2

Rebirth Of Demon King Rudransh - Episode 2

Rebirth Of Demon King Rudransh

"रुद्रांश का रूपांतरण और प्रतिशोध की आग"

रुद्रांश की आंखों में एक अजीब सी चमक आ जाती है—एक ऐसी गहरी और रहस्यमयी चमक जो उस कमजोर १४ वर्ष के अर्जुन की आंखों में कभी नहीं हो सकती थी। उसने अपनी आंखें बंद कीं और अपने शरीर के भीतर बहने वाली ऊर्जा पर ध्यान लगाया।

किंतु, जैसे ही उसकी चेतना उसके आंतरिक संसार (Internal Realm) में उतरी, वह दंग रह गया। उसे अपने अंदर एक "सुनहरा कंकाल (Golden Skeleton)" मिला, जिसके चारों तरफ एक घनी, काली रहस्यमयी ऊर्जा (Dark Power) चक्रवात की तरह घूम रही थी। उस ऊर्जा से कोई गर्मी नहीं, बल्कि एक रोंगटे खड़े कर देने वाली बर्फीली ठंडक का अहसास हो रहा था।

रुद्रांश ने हैरान होकर मन ही मन सोचा:

"यह क्या है मेरे अंदर? यह अलौकिक कंकाल मेरे भीतर कब आया, मुझे पता क्यों नहीं चला? क्या यह मेरी आत्मा से जुड़ा है, या फिर यह इस कमजोर अर्जुन के शरीर का कोई छुपा हुआ रहस्य है? लेकिन मैंने अपने पिछले जन्म में, जब मैं अपनी शक्ति के शिखर पर था, तब भी ऐसी कोई चीज़ नहीं देखी थी।"

फिर रुद्रांश उस सुनहरे कंकाल पर अपना ध्यान केंद्रित करता है, किंतु वह प्राचीन कंकाल शांत रहता है और कोई प्रतिक्रिया नहीं देता। रुद्रांश को अपने अनुभव से आभास होता है कि यह सुनहरा कंकाल किसी प्रकार से उसके पिछले जन्म के प्रतिबंधित ज्ञान यानी "'स्वर्ग भक्षक युद्ध कानून' (Heaven Devouring War Law)" से गहरा संबंध रखता है।

अपनी शंका को दूर करने के लिए, वह जैसे ही उस प्राचीन तकनीक को सक्रिय करने लगता है, वैसे ही कंकाल के चारों ओर लिपटी डार्क पावर उग्र हो जाती है और रुद्रांश की नसों में बहने लगती है। रुद्रांश को ऐसा भयानक दर्द महसूस होता है जैसे उसे हज़ारों ज़हरीली चींटियां एक साथ अंदर से खा रही हों।

"डेमन क्यूई (Demon Qi) का प्रकोप"

वह इस असहनीय वेदना को रोकने का प्रयास करता है, अपनी इच्छाशक्ति को पूरी तरह झोंक देता है, किंतु वह उस प्रचंड प्रवाह को रोक नहीं पाता। बल्कि, वह काली शक्तियां और तेज़ी से उसके शरीर के बाहर निकलकर उसकी त्वचा को संक्षारित (corrode) करने लगती हैं। उसकी त्वचा पिघलने लगती है और एक प्राचीन, शुद्ध "'डेमन क्यूई' (Demon Qi)" उसके सुनहरे कंकाल पर लिपटने लगती है।

उस डेमन क्यूई के भयानक प्रभाव के कारण पूरे कमरे का तापमान अचानक गिर जाता है और चारों तरफ बर्फीली धुंध फैल जाती है। कमरे की दीवारों पर बर्फ की परतें जमने लगती हैं।

रुद्रांश दर्द के मारे मन ही मन खुद को कोसता है, लेकिन इस तबाही को रोकने का उसके पास कोई उपाय नहीं था। सबसे बड़ी विडंबना यह थी कि इस नरक जैसे दर्द के बावजूद रुद्रांश बेहोश भी नहीं हो पा रहा था; उसकी चेतना पूरी तरह जागृत थी ताकि वह इस रूपांतरण के एक-एक पल को महसूस कर सके।

धीरे-धीरे, वह पूरी डार्क पावर रुद्रांश के नए सुनहरे कंकाल में समा जाती है और उसकी पिघली हुई त्वचा का फिर से पुनर्निर्माण होता है। अब उसकी नई त्वचा पहले से कहीं अधिक मजबूत, चमकदार और अभेद्य हो चुकी थी, जिस पर प्राचीन आध्यात्मिक प्रतीकों (Spiritual Runes) के रहस्यमयी पैटर्न उभर कर चमक रहे थे।

"अनामिका का भय और समर्पण"

कमरे से आ रही हड्डियों के चटकने और बर्फीली हवाओं की अजीब आवाज़ों को सुनकर अनामिका घबराकर भागी चली आती है। जैसे ही वह दरवाजा खोलती है, उसकी नज़र रुद्रांश पर पड़ती है। रुद्रांश की आंखें इस समय पूरी तरह बदल चुकी थीं—एक डरावनी, खून जैसी लाल और अंतहीन अंधेरे जैसी काली आंखें, जिन्हें देखकर ऐसा लग रहा था मानो वह सीधे नरक के सबसे गहरे हिस्से से उठकर आया कोई प्राचीन असुर हो।

उस भयानक और शक्तिशाली आभा (Aura) को देखकर अनामिका का दिल बैठ जाता है और वह बुरी तरह डर जाती है। इतने में, शरीर की पूरी ऊर्जा निचोड़ जाने के कारण रुद्रांश अचानक बेहोश होकर जमीन पर गिर जाता है।

अनामिका कांपते हुए कदमों से रुद्रांश के पास जाती है। उसका दिल डर से धड़क रहा था, लेकिन रुद्रांश के प्रति उसकी चिंता कहीं अधिक थी। वह हिम्मत जुटाकर उसे संभालती है और भारी मशक्कत के बाद उसे बिस्तर पर सुला देती है। बिस्तर के पास बैठकर अनामिका को रुद्रांश का वह डरावना रूप बार-बार याद आ रहा था, जिससे उसकी आंखों से आंसू बहने लगते हैं। वह रोते-रोते कब रुद्रांश के हाथ को थामे वहीं सो जाती है, उसे पता ही नहीं चलता।

जब सुबह रुद्रांश को होश आता है, तो उसे अपने हाथों पर दो कोमल छोटी हथेलियों का दबाव महसूस होता है। साथ ही उसे अपनी कमीज़ का सीने वाला हिस्सा अनामिका के आंसुओं से गीला मिलता है।

रुद्रांश जैसे ही अनामिका को अपने इतने पास, इस तरह मासूमियत से सोते हुए देखता है, तो उसके पत्थर हो चुके दिल के एक अनजाने कोने में एक अजीब सी हलचल होती है। उसके मन में अनामिका को पूरी दुनिया से बचाकर, हमेशा संभालकर रखने का एक गहरा ख्याल आता है। वह भावुक हो उठता है और अत्यंत कोमलता से अनामिका के सिर पर हाथ फेरने लगता है।

उस कोमल स्पर्श से अनामिका की आंखें खुल जाती हैं। वह किसी डरे हुए जंगली खरगोश की तरह झटके से पीछे उछलकर खड़ी हो जाती है और रुद्रांश के इतने करीब होने के अहसास से शर्म से लाल हो जाती है। किंतु, अगले ही पल जैसे ही उसे बीती रात की वह खूंखार लाल आंखें याद आती हैं, उसका सारा संकोच डर में बदल जाता है और वह थर-थर कांपने लगती है।

यह देखकर रुद्रांश अपनी आवाज़ को जितना हो सके उतना धीमा और शांत करते हुए कहता है, *"मुझसे डर क्यों रही हो, अनामिका?"*

रुद्रांश का इतना सौम्य और रक्षक जैसा रूप देखकर अनामिका धीरे से अपनी नज़रें ऊपर उठाती है। रुद्रांश की आंखों में इस समय उस भयानक असुर की जगह केवल उसके लिए एक असीम कोमलता और फिक्र थी। यह देखकर अनामिका का डर हवा हो जाता है, और वह लोक-लाज के मारे बुरी तरह शर्माकर कमरे से बाहर भाग जाती है।

"अतीत का धोखा और आंतरिक द्वंद्व"

अनामिका के जाने के बाद कमरे में सन्नाटा छा जाता है। रुद्रांश अपने हाथों को देखता है, जिन पर अब आध्यात्मिक रून्स छिपे हुए थे, और गहरी सोच में डूब जाता है:

"यह मुझे क्या हो गया है? मैं, जो कभी किसी पर भरोसा नहीं करता, इस लड़की अनामिका के प्रति इतना कमजोर और कोमल कैसे हो सकता हूँ? इस संसार का तो नियम ही यही है कि यहाँ हर कोई मतलबी है। जब मेरी खुद की प्रेमिका "दिव्यांशी" और जिसे मैं अपना भाई मानता था, उस दोस्त "सूर्यवर्धन" ने मिलकर मेरी पीठ में छुरा घोंपा और मुझे धोखा दिया... तो मैं फिर से किसी पर दया कैसे कर सकता हूँ?"

वह अपने माथे पर हाथ रखता है और बड़ी कड़वाहट के साथ खुद से सवाल करता है:

"क्या इस कमज़ोर अर्जुन के शरीर में रहने के कारण, उसकी बची-कुची भावनाएं और उसकी मासूम सोच मेरे महान अस्तित्व को प्रभावित कर रही हैं? नहीं! मैं ऐसा नहीं होने दे सकता। "मुझे अपनी भावनाओं को मारकर सिर्फ अपने प्रतिशोध पर ध्यान देना होगा। दिव्यांशी और सूर्यवर्धन... तुम दोनों ने जो मुझसे छीना है, मैं उसका एक-एक कतरा वापस लूंगा, चाहे मुझे इस पूरी दुनिया को ही क्यों न तबाह करना पड़े!"

**रुद्रांश का रूपांतरण और प्रतिशोध की आग**

रुद्रांश की आंखों में एक अजीब सी चमक आ जाती है—एक ऐसी गहरी और रहस्यमयी चमक जो उस कमजोर १४ वर्ष के अर्जुन की आंखों में कभी नहीं हो सकती थी। उसने अपनी आंखें बंद कीं और अपने शरीर के भीतर बहने वाली ऊर्जा पर ध्यान लगाया।

किंतु, जैसे ही उसकी चेतना उसके आंतरिक संसार (Internal Realm) में उतरी, वह दंग रह गया। उसे अपने अंदर एक **सुनहरा कंकाल (Golden Skeleton)** मिला, जिसके चारों तरफ एक घनी, काली रहस्यमयी ऊर्जा (Dark Power) चक्रवात की तरह घूम रही थी। उस ऊर्जा से कोई गर्मी नहीं, बल्कि एक रोंगटे खड़े कर देने वाली बर्फीली ठंडक का अहसास हो रहा था।

रुद्रांश ने हैरान होकर मन ही मन सोचा:

"यह क्या है मेरे अंदर? यह अलौकिक कंकाल मेरे भीतर कब आया, मुझे पता क्यों नहीं चला? क्या यह मेरी आत्मा से जुड़ा है, या फिर यह इस कमजोर अर्जुन के शरीर का कोई छुपा हुआ रहस्य है? लेकिन मैंने अपने पिछले जन्म में, जब मैं अपनी शक्ति के शिखर पर था, तब भी ऐसी कोई चीज़ नहीं देखी थी।"

फिर रुद्रांश उस सुनहरे कंकाल पर अपना ध्यान केंद्रित करता है, किंतु वह प्राचीन कंकाल शांत रहता है और कोई प्रतिक्रिया नहीं देता। रुद्रांश को अपने अनुभव से आभास होता है कि यह सुनहरा कंकाल किसी प्रकार से उसके पिछले जन्म के प्रतिबंधित ज्ञान यानी **'स्वर्ग भक्षक युद्ध कानून' (Heaven Devouring War Law)** से गहरा संबंध रखता है।

अपनी शंका को दूर करने के लिए, वह जैसे ही उस प्राचीन तकनीक को सक्रिय करने लगता है, वैसे ही कंकाल के चारों ओर लिपटी डार्क पावर उग्र हो जाती है और रुद्रांश की नसों में बहने लगती है। रुद्रांश को ऐसा भयानक दर्द महसूस होता है जैसे उसे हज़ारों ज़हरीली चींटियां एक साथ अंदर से खा रही हों।

**डेमन क्यूई (Demon Qi) का प्रकोप**

वह इस असहनीय वेदना को रोकने का प्रयास करता है, अपनी इच्छाशक्ति को पूरी तरह झोंक देता है, किंतु वह उस प्रचंड प्रवाह को रोक नहीं पाता। बल्कि, वह काली शक्तियां और तेज़ी से उसके शरीर के बाहर निकलकर उसकी त्वचा को संक्षारित (corrode) करने लगती हैं। उसकी त्वचा पिघलने लगती है और एक प्राचीन, शुद्ध **'डेमन क्यूई' (Demon Qi)** उसके सुनहरे कंकाल पर लिपटने लगती है।

उस डेमन क्यूई के भयानक प्रभाव के कारण पूरे कमरे का तापमान अचानक गिर जाता है और चारों तरफ बर्फीली धुंध फैल जाती है। कमरे की दीवारों पर बर्फ की परतें जमने लगती हैं।

रुद्रांश दर्द के मारे मन ही मन खुद को कोसता है, लेकिन इस तबाही को रोकने का उसके पास कोई उपाय नहीं था। सबसे बड़ी विडंबना यह थी कि इस नरक जैसे दर्द के बावजूद रुद्रांश बेहोश भी नहीं हो पा रहा था; उसकी चेतना पूरी तरह जागृत थी ताकि वह इस रूपांतरण के एक-एक पल को महसूस कर सके।

धीरे-धीरे, वह पूरी डार्क पावर रुद्रांश के नए सुनहरे कंकाल में समा जाती है और उसकी पिघली हुई त्वचा का फिर से पुनर्निर्माण होता है। अब उसकी नई त्वचा पहले से कहीं अधिक मजबूत, चमकदार और अभेद्य हो चुकी थी, जिस पर प्राचीन आध्यात्मिक प्रतीकों (Spiritual Runes) के रहस्यमयी पैटर्न उभर कर चमक रहे थे।

**अनामिका का भय और समर्पण**

कमरे से आ रही हड्डियों के चटकने और बर्फीली हवाओं की अजीब आवाज़ों को सुनकर अनामिका घबराकर भागी चली आती है। जैसे ही वह दरवाजा खोलती है, उसकी नज़र रुद्रांश पर पड़ती है। रुद्रांश की आंखें इस समय पूरी तरह बदल चुकी थीं—एक डरावनी, खून जैसी लाल और अंतहीन अंधेरे जैसी काली आंखें, जिन्हें देखकर ऐसा लग रहा था मानो वह सीधे नरक के सबसे गहरे हिस्से से उठकर आया कोई प्राचीन असुर हो।

उस भयानक और शक्तिशाली आभा (Aura) को देखकर अनामिका का दिल बैठ जाता है और वह बुरी तरह डर जाती है। इतने में, शरीर की पूरी ऊर्जा निचोड़ जाने के कारण रुद्रांश अचानक बेहोश होकर जमीन पर गिर जाता है।

अनामिका कांपते हुए कदमों से रुद्रांश के पास जाती है। उसका दिल डर से धड़क रहा था, लेकिन रुद्रांश के प्रति उसकी चिंता कहीं अधिक थी। वह हिम्मत जुटाकर उसे संभालती है और भारी मशक्कत के बाद उसे बिस्तर पर सुला देती है। बिस्तर के पास बैठकर अनामिका को रुद्रांश का वह डरावना रूप बार-बार याद आ रहा था, जिससे उसकी आंखों से आंसू बहने लगते हैं। वह रोते-रोते कब रुद्रांश के हाथ को थामे वहीं सो जाती है, उसे पता ही नहीं चलता।

जब सुबह रुद्रांश को होश आता है, तो उसे अपने हाथों पर दो कोमल छोटी हथेलियों का दबाव महसूस होता है। साथ ही उसे अपनी कमीज़ का सीने वाला हिस्सा अनामिका के आंसुओं से गीला मिलता है।

रुद्रांश जैसे ही अनामिका को अपने इतने पास, इस तरह मासूमियत से सोते हुए देखता है, तो उसके पत्थर हो चुके दिल के एक अनजाने कोने में एक अजीब सी हलचल होती है। उसके मन में अनामिका को पूरी दुनिया से बचाकर, हमेशा संभालकर रखने का एक गहरा ख्याल आता है। वह भावुक हो उठता है और अत्यंत कोमलता से अनामिका के सिर पर हाथ फेरने लगता है।

उस कोमल स्पर्श से अनामिका की आंखें खुल जाती हैं। वह किसी डरे हुए जंगली खरगोश की तरह झटके से पीछे उछलकर खड़ी हो जाती है और रुद्रांश के इतने करीब होने के अहसास से शर्म से लाल हो जाती है। किंतु, अगले ही पल जैसे ही उसे बीती रात की वह खूंखार लाल आंखें याद आती हैं, उसका सारा संकोच डर में बदल जाता है और वह थर-थर कांपने लगती है।

यह देखकर रुद्रांश अपनी आवाज़ को जितना हो सके उतना धीमा और शांत करते हुए कहता है, *"मुझसे डर क्यों रही हो, अनामिका?"*

रुद्रांश का इतना सौम्य और रक्षक जैसा रूप देखकर अनामिका धीरे से अपनी नज़रें ऊपर उठाती है। रुद्रांश की आंखों में इस समय उस भयानक असुर की जगह केवल उसके लिए एक असीम कोमलता और फिक्र थी। यह देखकर अनामिका का डर हवा हो जाता है, और वह लोक-लाज के मारे बुरी तरह शर्माकर कमरे से बाहर भाग जाती है।

**अतीत का धोखा और आंतरिक द्वंद्व**

अनामिका के जाने के बाद कमरे में सन्नाटा छा जाता है। रुद्रांश अपने हाथों को देखता है, जिन पर अब आध्यात्मिक रून्स छिपे हुए थे, और गहरी सोच में डूब जाता है:

"यह मुझे क्या हो गया है? मैं, जो कभी किसी पर भरोसा नहीं करता, इस लड़की अनामिका के प्रति इतना कमजोर और कोमल कैसे हो सकता हूँ? इस संसार का तो नियम ही यही है कि यहाँ हर कोई मतलबी है। जब मेरी खुद की प्रेमिका **दिव्यांशी** और जिसे मैं अपना भाई मानता था, उस दोस्त **सूर्यवर्धन** ने मिलकर मेरी पीठ में छुरा घोंपा और मुझे धोखा दिया... तो मैं फिर से किसी पर दया कैसे कर सकता हूँ?"

वह अपने माथे पर हाथ रखता है और बड़ी कड़वाहट के साथ खुद से सवाल करता है:

"क्या इस कमज़ोर अर्जुन के शरीर में रहने के कारण, उसकी बची-कुची भावनाएं और उसकी मासूम सोच मेरे महान अस्तित्व को प्रभावित कर रही हैं? नहीं! मैं ऐसा नहीं होने दे सकता। "मुझे अपनी भावनाओं को मारकर सिर्फ अपने प्रतिशोध पर ध्यान देना होगा। दिव्यांशी और सूर्यवर्धन... तुम दोनों ने जो मुझसे छीना है, मैं उसका एक-एक कतरा वापस लूंगा, चाहे मुझे इस पूरी दुनिया को ही क्यों न तबाह करना पड़े!"

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