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Chapter 1

Aryan The Supreme Emperor - Episode 1

Aryan The Supreme Emperor

पूर्व दिशा.

क्षितिज के उस पार से उगते सूर्य की पहली किरणें जब अरण्यपुर की हरी- भरी घाटियों पर पडीं, तो ओस की छोटी- छोटी बूंदें ऐसे चमक उठीं जैसे धरती ने असंख्य मोती बिखेर दिए हों.

ठंडी हवा पहाडों से उतरकर खेतों के बीच से गुजर रही थी. दूर नदी का स्वच्छ जल चट्टानों से टकराकर मधुर संगीत बना रहा था. पक्षियों की चहचहाहट पूरे वातावरण में जीवन का संदेश फैला रही थी.

अरण्यपुर.

यह कोई बडा नगर नहीं था.

न यहाँ ऊँची- ऊँची पत्थर की दीवारें थीं.

न विशाल राजमहल.

न कोई प्रसिद्ध मार्शल संप्रदाय.

यह केवल एक छोटा- सा गाँव था.

जहाँ लोग एक- दूसरे को नाम से जानते थे और सुख- दुःख में साथ खडे रहते थे.

लेकिन इस गाँव की एक विशेषता थी.

यह गाँव अरण्य पर्वत और नागवन के बीच बसा था.

गाँव के बुजुर्ग कहते थे कि इन पहाडों के भीतर कभी महान मार्शल योद्धाओं ने साधना की थी.

आज उन कथाओं को लोग सिर्फ दंतकथा समझते थे.

लेकिन.

हर दंतकथा की जड में कहीं न कहीं एक सच्चाई छिपी होती है.

ठक.

ठक.

ठक.

सुबह की शांति को भंग करती हथौडे की आवाज गाँव के पूर्वी छोर से आ रही थी.

वहाँ मिट्टी और पत्थरों से बना एक साधारण- सा घर था.

घर के पीछे बनी छोटी- सी भट्ठी में तेज आग जल रही थी.

भट्ठी के सामने खडा एक मजबूत व्यक्ति लाल तपे लोहे पर लगातार हथौडा चला रहा था.

उसका हर प्रहार नपा- तुला था.

न एक प्रहार कम.

न एक अधिक.

उसका नाम था—

वीरेंद्र.

अरण्यपुर का लोहार.

लेकिन गाँव के लोग उसे केवल लोहार नहीं मानते थे.

वे कहते थे—

यदि वीरेंद्र कोई औजार बना दे, तो वह वर्षों तक साथ नहीं छोडता।

वीरेंद्र इन बातों पर कभी गर्व नहीं करते थे.

उनके लिए काम ही पूजा था.

भट्ठी के दूसरी ओर एक किशोर धौंकनी चला रहा था.

उसके हाथों में छाले थे.

माथे पर पसीना था.

लेकिन चेहरे पर शिकायत का एक भी भाव नहीं.

उसकी आँखों में केवल सीखने की इच्छा थी.

वह था—

आर्यन.

सोलह वर्ष का एक साधारण लडका.

न उसके पास कोई दिव्य शक्ति थी.

न कोई महान रक्तरेखा.

न कोई प्रसिद्ध गुरु.

वह केवल एक लोहार का बेटा था.

जो हर दिन मेहनत करता था.

आग को देखो.

वीरेंद्र ने बिना पीछे मुडे कहा.

आर्यन ने तुरंत धौंकनी की गति बदली.

कुछ ही क्षणों में आग पहले से अधिक प्रचंड हो उठी.

वीरेंद्र मुस्कुराए.

अच्छा।

उन्होंने तपते हुए लोहे को बाहर निकाला.

हथौडा उठाया.

और एक के बाद एक प्रहार करने लगे.

ठक!

ठक!

ठक!

आर्यन हर प्रहार को ध्यान से देख रहा था.

उसे हमेशा यह कला अद्भुत लगती थी.

क बेकार लोहे का टुकडा.

धीरे- धीरे आकार लेने लगता था.

कुछ देर बाद वीरेंद्र ने हथौडा नीचे रखा.

बताओ.

तुम्हें इसमें क्या दिखाई देता है?

आर्यन ने उस अधबने औजार को देखा.

एक हल का फाल।

वीरेंद्र मुस्कुराए.

मुझे भी यही दिखाई देता है.

लेकिन एक किसान को इसमें अपने परिवार का पेट दिखाई देगा।

आर्यन कुछ पल के लिए चुप रह गया.

वीरेंद्र ने आगे कहा—

याद रखना.

हर काम का सम्मान करो. क्योंकि किसी का साधारण काम. किसी दूसरे के जीवन की सबसे बडी जरूरत हो सकता है।

आर्यन ने सिर झुका दिया.

मैं याद रखूँगा, पिताजी।

उसी समय घर के भीतर से एक मधुर आवाज आई—

आर्यन.

जरा इधर आओ बेटा।

वह उसकी माँ, सरस्वती, की आवाज थी.

आर्यन ने तुरंत उत्तर दिया—

जी माँ!

वह भट्ठी से बाहर निकला.

आँगन में तरह- तरह की जडी- बूटियाँ धूप में सूख रही थीं.

सरस्वती मुस्कुराईं और एक छोटी टोकरी उसकी ओर बढाई.

इन्हें नदी के पानी से धोकर लाना।

आर्यन ने टोकरी हाथ में ली.

आज कौन- सी जडी है?

जीवनपर्णी।

यह Kiss काम आती है?

सरस्वती ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा—

घाव भरने में.

लेकिन.

दवा तभी काम करती है, जब उसे देने वाले के मन में दया हो।

आर्यन हल्का- सा मुस्कुराया.

उसे हमेशा लगता था कि उसके माता- पिता हर साधारण काम में जीवन का कोई बडा सत्य छिपा देते हैं.

उसने टोकरी उठाई.

और नदी की ओर चल पडा.

उसे नहीं पता था.

कि आज की यह साधारण सुबह.

उसके जीवन की सबसे महत्वपूर्ण यात्राओं में से एक की पहली सीढी बनने वाली थी.

आर्यन बाँस की बनी छोटी टोकरी हाथ में लेकर घर से बाहर निकला.

सुबह की धूप अब पूरे गाँव में फैल चुकी थी.

मिट्टी की सँकरी गलियों में लोग अपने- अपने काम में लग चुके थे. कहीं महिलाएँ घर के सामने आँगन लीप रही थीं, कहीं बच्चे लकडी की छोटी तलवारें लेकर खेल रहे थे.

मार!

मैं तुझे हरा दूँगा!

मैं अरण्यपुर का सबसे बडा योद्धा बनूँगा!

एक छोटा बच्चा लकडी की तलवार घुमाते हुए जोर से चिल्लाया.

दूसरा लडका तुरंत बोला,

नहीं! मैं बनूँगा!

आर्यन उन्हें देखकर मुस्कुरा दिया.

उसे अपना बचपन याद आ गया.

वह भी कभी ऐसे ही खेला करता था.

लेकिन पिछले कुछ वर्षों में उसने खेलना कम और काम करना ज्यादा शुरू कर दिया था.

गली के मोड पर एक बूढी दादी लकडियों का भारी गट्ठर उठाने की कोशिश कर रही थीं.

आर्यन तुरंत उनके पास पहुँचा.

दादी, रहने दीजिए।

मैं उठा देता हूँ।

दादी मुस्कुराईं.

अरे बेटा, तू तो सुबह- सुबह काम पर निकल गया।

आर्यन ने बिना कुछ कहे गट्ठर अपने कंधे पर रख लिया.

घर तक छोड देता हूँ।

कुछ ही मिनटों में वह दादी के घर पहुँच गया.

दादी ने आशीर्वाद देते हुए कहा,

बेटा, भगवान तुझे हमेशा खुश रखे।

आर्यन मुस्कुरा दिया.

आपका आशीर्वाद ही काफी है।

वह वापस चल पडा.

उसे यह एहसास भी नहीं था कि गाँव के कई बुजुर्ग उसे अपने बेटे जैसा मानते थे.

नदी तक पहुँचने वाला रास्ता खेतों के बीच से होकर जाता था.

चारों तरफ गेहूँ की सुनहरी बालियाँ हवा के साथ झूम रही थीं.

कुछ किसान हल चला रहे थे.

जैसे ही उन्होंने आर्यन को देखा—

अरे आर्यन!

एक किसान ने आवाज लगाई.

तुम्हारे पिता ने जो हल बनाया था, वह कमाल का निकला।

दूसरे किसान ने हँसते हुए कहा,

अब तो लगता है इस साल फसल दुगनी होगी।

आर्यन विनम्रता से बोला,

यह सब पिता जी की मेहनत है, चाचा।

किसान मुस्कुराए.

और एक दिन लोग यही बात तुम्हारे बारे में भी कहेंगे।

आर्यन ने कोई उत्तर नहीं दिया.

वह ऐसी बातों पर कभी घमंड नहीं करता था.

कुछ देर बाद वह नदी किनारे पहुँच गया.

नदी का पानी इतना साफ था कि नीचे पडे छोटे- छोटे पत्थर भी साफ दिखाई दे रहे थे.

उसने टोकरी नीचे रखी और जडी- बूटियाँ धोने लगा.

पानी की ठंडी लहरें उसके हाथों से टकरा रही थीं.

उसी समय पीछे से किसी ने उसकी आँखें बंद कर दीं.

बताओ मैं कौन हूँ?

आर्यन हल्का- सा मुस्कुराया.

मोहन।

पीछे से जोर की हँसी सुनाई दी.

अरे! हर बार पहचान लेता है।

आर्यन मुडा.

उसके सामने उसका बचपन का दोस्त मोहन खडा था.

थोडा गोल- मटोल शरीर.

हमेशा मुस्कुराता हुआ चेहरा.

और हाथ में.

एक बडा- सा आम.

देख!

उसने गर्व से आम दिखाया.

आज सुबह पेड से तोडा है।

आर्यन हँस पडा.

तू सुधरेगा नहीं।

अरे! चोरी नहीं की. मालिक से पूछकर लिया है।

दोनों हँसने लगे.

उसी समय पीछे से एक गंभीर आवाज आई—

तुम दोनों को हँसी- मजाक के अलावा कुछ आता भी है?

दोनों ने मुडकर देखा.

वहाँ करण खडा था.

मजबूत शरीर.

सीधा स्वभाव.

और आँखों में आत्मविश्वास.

वह हमेशा गाँव के युवाओं के साथ शारीरिक अभ्यास करता था.

मोहन ने मजाक उडाया.

लो आ गया हमारा गुरुजी।

करण ने उसे घूरा.

अगर रोज अभ्यास करता, तो आज इतना आलसी नहीं होता।

मैं आलसी नहीं हूँ.

मोहन ने आम का एक बडा टुकडा मुँह में डालते हुए कहा.

मैं ऊर्जा बचाता हूँ।

तीनों जोर से हँस पडे.

उसी समय एक पतला- दुबला लडका दौडता हुआ आया.

साँस फूल रही थी.

रुको. मेरे बिना हँसी शुरू कर दी?

यह था—

निखिल.

चारों की दोस्ती बचपन से थी.

उनका स्वभाव बिल्कुल अलग था.

लेकिन दोस्ती बहुत गहरी थी.

चारों दोस्त नदी किनारे बैठ गए.

मोहन आम काटने लगा.

निखिल ने धीरे से कहा,

सुना है. अगले महीने पहाडी रास्ते से कुछ व्यापारी आने वाले हैं।

करण की आँखें चमक उठीं.

सच?

हाँ।

सुना है उनके साथ मार्शल योद्धा भी होंगे।

यह सुनते ही आर्यन पहली बार ध्यान से उनकी बात सुनने लगा.

मार्शल योद्धा?

निखिल ने सिर हिलाया.

दादा जी बता रहे थे कि दूर के राज्यों में ऐसे लोग रहते हैं जो पत्थर तोड देते हैं.

और बिना घोडे के ऊँची दीवार पार कर लेते हैं।

मोहन तुरंत बोला,

अरे छोड!

ऐसी बातें सिर्फ कहानियों में होती हैं।

लेकिन करण गंभीर था.

नहीं.

मैंने भी सुना है।

अगर सच में ऐसे लोग हैं.

तो मैं एक दिन उनसे जरूर मिलूँगा।

आर्यन चुप रहा.

उसने बचपन से मार्शल योद्धाओं की कहानियाँ सुनी थीं.

लेकिन उसने कभी किसी को देखा नहीं था.

उसके मन में एक छोटा- सा सवाल उठा—

क्या सचमुच इस दुनिया में ऐसे लोग हैं. जो साधारण इंसानों से इतने अलग होते हैं?

उसी समय.

नदी के उस पार.

घने जंगल की छाया में.

कोई खडा था.

उसकी आँखें चारों लडकों पर टिकी थीं.

लेकिन विशेष रूप से.

आर्यन पर.

कुछ क्षण बाद वह व्यक्ति मुडा.

और बिना कोई आवाज किए जंगल की गहराइयों में गायब हो गया.

किसी ने उसे देखा नहीं.

किसी ने उसकी आहट तक नहीं सुनी.

लेकिन.

कहानी का पहला अदृश्य धागा जुड चुका था.

नदी से लौटते समय चारों दोस्त गाँव के मुख्य मार्ग पर साथ- साथ चल रहे थे.

मोहन आम खा रहा था.

करण रास्ते में पडे पत्थरों पर पैर रखकर संतुलन बनाने का अभ्यास कर रहा था.

निखिल अपने दादा से सुनी हुई कहानियाँ सुनाने में व्यस्त था.

और आर्यन.

वह हमेशा की तरह सबकी बातें सुनते हुए आसपास की दुनिया को ध्यान से देख रहा था.

उसकी यही आदत थी.

वह कम बोलता था.

लेकिन हर छोटी बात को याद रखता था.

अरण्यपुर का साप्ताहिक बाजार

आज गाँव में सामान्य दिन नहीं था.

हर सातवें दिन अरण्यपुर में साप्ताहिक बाजार लगता था.

पास के पाँच- छह गाँवों के लोग यहाँ आते थे.

कहीं ताजे फल बिक रहे थे.

कहीं मिट्टी के बर्तन.

कहीं कपडे.

कहीं मसाले.

कहीं शहद.

बच्चों के लिए लकडी के खिलौने भी थे.

पूरा बाजार लोगों की आवाजों से गूँज रहा था.

ताजा शहद!

नई फसल का गेहूँ!

सबसे अच्छे बर्तन!

जडी- बूटियाँ. दुर्लभ जडी- बूटियाँ!

मोहन की नजर सीधे मिठाइयों की दुकान पर गई.

चलो.

पहले Good की रेवडी खाते हैं।

करण ने उसका कान पकड लिया.

पहले घर का काम पूरा कर।

मोहन ने मुँह बना लिया.

तू पिछले जन्म में जरूर कोई गुरु रहा होगा।

निखिल और आर्यन हँस पडे.

उसी समय बाजार के प्रवेश द्वार पर हलचल हुई.

चार बडे बैलगाडे धीरे- धीरे गाँव में दाखिल हुए.

उन पर अलग- अलग राज्यों की मुहरें बनी थीं.

व्यापारी आ गए!

किसी ने ऊँची आवाज में कहा.

गाँव के लोग तुरंत उनकी ओर बढ गए.

आर्यन भी उत्सुकता से देखने लगा.

उसने पहली बार इतने अलग- अलग कपडे पहने लोगों को देखा.

कुछ लोगों की भाषा भी अलग थी.

एक व्यापारी के कपडों पर सुनहरी कढाई थी.

दूसरे के पास चमडे का लंबा कोट था.

तीसरे की कमर में एक सुंदर तलवार लटक रही थी.

आर्यन की नजर उसी तलवार पर टिक गई.

वह साधारण तलवार नहीं थी.

उसकी म्यान पर नीले रंग का पत्थर जडा हुआ था.

धूप पडते ही वह हल्की- सी चमकने लगा.

आर्यन ने धीरे से पूछा,

क्या यह लोहे की बनी है?

व्यापारी मुस्कुराया.

हाँ.

लेकिन साधारण लोहा नहीं।

इसे पर्वतीय इस्पात से बनाया गया है।

आर्यन की आँखें चमक उठीं.

क्या मैं इसे पास से देख सकता हूँ?

व्यापारी ने कुछ पल उसे देखा.

फिर तलवार म्यान सहित उसके हाथ में दे दी.

तलवार उम्मीद से कहीं ज्यादा भारी थी.

आर्यन ने दोनों हाथों से उसे संभाला.

उसने ध्यान से उसकी बनावट देखी.

हथेली की पकड.

धार का संतुलन.

म्यान की बनावट.

सब कुछ अलग था.

व्यापारी ने मुस्कुराकर पूछा,

तुम लोहार के बेटे हो?

आर्यन चौंक गया.

आपको कैसे पता?

व्यापारी हँसा.

जिस तरह तुम तलवार को देख रहे हो.

वैसे योद्धा नहीं.

लोहार देखते हैं।

आर्यन हल्का- सा मुस्कुरा दिया.

उसी समय व्यापारी ने धीरे से कहा,

अगर मेहनत करोगे.

तो एक दिन ऐसी तलवारें तुम भी बना सकते हो।

आर्यन ने तुरंत पूछा,

क्या आपने यह तलवार बनाई है?

व्यापारी ने सिर हिलाया.

नहीं।

इसे एक आर्टिफैक्ट रिफाइनर ने बनाया है।

आर्टिफैक्ट. रिफाइनर?

यह शब्द आर्यन ने पहली बार सुना था.

व्यापारी ने समझाया,

साधारण लोहार केवल धातु को आकार देता है।

लेकिन आर्टिफैक्ट रिफाइनर.

धातु के भीतर छिपी शक्ति को भी जगाता है।

आर्यन ध्यान से सुन रहा था.

उसे पहली बार महसूस हुआ.

कि लोहार की कला शायद उससे कहीं अधिक गहरी हो सकती है.

लेकिन व्यापारी तुरंत हँस पडा.

वैसे.

ये बातें अभी तुम्हारी उम्र के लिए बहुत बडी हैं।

पहले हथौडा ठीक से चलाना सीखो।

चारों दोस्त हँस पडे.

आर्यन भी मुस्कुरा दिया.

लेकिन.

उसके मन में एक नया प्रश्न जन्म ले चुका था.

क्या लोहार भी साधारण और असाधारण हो सकते हैं?

बाजार के बीच एक बूढा कहानीकार बच्चों को घेरकर बैठा था.

वह ऊँची आवाज में कहानी सुना रहा था.

और फिर उस महान योद्धा ने अपनी मुट्ठी से पूरा पहाड तोड दिया!

बच्चे एक साथ बोल उठे—

सच में?

बूढा मुस्कुराया.

शायद.

शायद नहीं।

लेकिन दुनिया बहुत बडी है।

हम जो नहीं जानते.

वह झूठ हो, यह जरूरी नहीं।

आर्यन भी कुछ देर वहीं खडा रहा.

उसके भीतर जिज्ञासा बढती जा रही थी.

दूसरी ओर.

गाँव से कुछ दूर.

घने जंगल के भीतर.

एक काले वस्त्रधारी व्यक्ति पेड की ऊँची शाखा पर बैठा था.

उसके हाथ में एक छोटा- सा दूरबीन जैसा यंत्र था.

वह पूरे गाँव को देख रहा था.

उसकी नजर अंत में आर्यन पर जाकर रुकी.

उसने धीरे से अपनी कमर से एक छोटी धातु की पट्टिका निकाली.

उस पर केवल दो शब्द उकेरे थे—

लक्ष्य चिन्हित।

उसने पट्टिका वापस रखी.

फिर बिना कोई आवाज किए.

वह पेडों की छाया में गायब हो गया. दोपहर का समय था.

अरण्यपुर का साप्ताहिक बाजार धीरे- धीरे शांत होने लगा था. व्यापारी अपने सामान समेट रहे थे और गाँव वाले खरीदारी करके अपने घर लौट रहे थे.

आर्यन भी अपने दोस्तों से विदा लेकर घर की ओर चल पडा.

लेकिन आज उसका मन बार- बार उसी तलवार की ओर जा रहा था, जिसे उसने बाजार में देखा था.

आर्टिफैक्ट रिफाइनर.

यह शब्द उसके मन में लगातार गूँज रहा था.

क्या सचमुच कोई ऐसा व्यक्ति हो सकता है जो केवल धातु ही नहीं, बल्कि उसके भीतर छिपी शक्ति को भी जागृत कर दे?

उसने गहरी साँस ली.

शायद. एक दिन मैं भी जानूँगा।

घर पहुँचते ही उसने देखा कि वीरेंद्र पहले से ही भट्ठी के सामने खडे थे.

भट्ठी में जलती लकडियों की आग तेजी से भडक रही थी.

वीरेंद्र ने पीछे देखे बिना कहा,

देर हो गई।

आर्यन ने सिर झुका दिया.

माफ कीजिए पिताजी. बाजार में व्यापारी आए थे।

वीरेंद्र ने मुस्कुराकर कहा,

पहली बार देखा होगा?

जी।

कुछ नया सीखा?

आर्यन कुछ पल चुप रहा.

फिर बोला,

एक व्यापारी ने कहा कि साधारण लोहार और आर्टिफैक्ट रिफाइनर में अंतर होता है।

वीरेंद्र का हथौडा एक पल के लिए रुक गया.

लेकिन अगले ही क्षण उन्होंने फिर सामान्य गति से काम करना शुरू कर दिया.

दुनिया बहुत बडी है, बेटा।

हर कला की अपनी ऊँचाइयाँ होती हैं।

लेकिन.

उन्होंने आर्यन की ओर देखा.

जो पहली सीढी पर खडा है, उसे पहले उसी पर मजबूती से खडा होना सीखना चाहिए।

आर्यन ने समझते हुए सिर हिलाया.

वीरेंद्र ने एक छोटा लोहे का टुकडा उठाकर आर्यन के हाथ में दिया.

आज से.

तुम सिर्फ धौंकनी नहीं चलाओगे।

आर्यन की आँखें चमक उठीं.

सच?

हाँ।

आज तुम पहला हथौडा चलाओगे।

आर्यन का दिल तेजी से धडकने लगा.

यह वही दिन था जिसका उसे कई वर्षों से इंतजार था.

वीरेंद्र ने लाल तपते लोहे को निहाई पर रखा.

फिर अपना हथौडा आर्यन की ओर बढाया.

उठाओ।

आर्यन ने हथौडा उठाया.

वह उम्मीद से कहीं ज्यादा भारी था.

उसने दोनों हाथों से उसे संभाला.

डरो मत।

वीरेंद्र शांत स्वर में बोले.

लोहे से नहीं.

अपनी जल्दबाजी से डरना चाहिए।

आर्यन ने गहरी साँस ली.

और.

ठक!

पहला प्रहार किया.

हथौडा लोहे से थोडा तिरछा टकराया.

वीरेंद्र ने कुछ नहीं कहा.

फिर से।

दूसरा प्रहार.

इस बार थोडा बेहतर.

तीसरा.

चौथा.

दसवाँ.

बीसवाँ.

धीरे- धीरे आर्यन की पकड स्थिर होने लगी.

उसके हाथ काँप रहे थे.

माथे से पसीना बह रहा था.

लेकिन उसने हथौडा नीचे नहीं रखा.

वीरेंद्र की आँखों में गर्व की हल्की चमक उभरी.

कुछ देर बाद वीरेंद्र ने हाथ उठाकर उसे रोक दिया.

अब.

आँखें बंद करो।

आर्यन हैरान हुआ.

आँखें?

हाँ।

और इस लोहे को हथौडे से हल्का- सा छुओ।

आर्यन ने वैसा ही किया.

टन्न.

एक हल्की ध्वनि गूँजी.

क्या सुना?

बस. आवाज।

वीरेंद्र मुस्कुराए.

नहीं।

वह सिर्फ आवाज नहीं थी।

हर धातु की अपनी भाषा होती है।

अगर कोई लोहार उसे सुनना सीख जाए.

तो वह जान सकता है कि धातु मजबूत है या कमजोर.

उसे और आग चाहिए या नहीं.

और वह Kiss काम के योग्य है।

आर्यन ने आश्चर्य से पूछा,

क्या आप सचमुच यह सब सुन लेते हैं?

वीरेंद्र ने उत्तर नहीं दिया.

उन्होंने केवल वही लोहे का टुकडा उठाया.

उसे उँगली से हल्का- सा थपथपाया.

कुछ क्षण आँखें बंद रखीं.

फिर बोले—

इसमें अभी भी एक दरार है।

आर्यन ने ध्यान से देखा.

उसे तो कुछ दिखाई नहीं दिया.

वीरेंद्र ने लोहे को पानी में डाला.

ठंडा होने के बाद उसे जोर से मोडा.

चटाक!

धातु ठीक उसी जगह से टूट गई.

जहाँ वीरेंद्र ने दरार होने की बात कही थी.

आर्यन की आँखें आश्चर्य से फैल गईं.

आपको कैसे पता चला?

वीरेंद्र हल्के से मुस्कुराए.

लोहे ने खुद बता दिया।

भट्ठी के एक कोने में कपडे से ढकी हुई एक लंबी वस्तु रखी थी.

हवा चलने से कपडा थोडा हट गया.

आर्यन की नजर उस पर पडी.

वह.

एक पुरानी तलवार थी.

लेकिन वह साधारण तलवार जैसी नहीं दिखती थी.

उसकी मूठ पर किसी अज्ञात प्रतीक की हल्की नक्काशी बनी हुई थी.

आर्यन ने उत्सुक होकर पूछा,

पिताजी.

यह तलवार किसकी है?

वीरेंद्र ने तुरंत कपडा वापस उस पर डाल दिया.

कुछ पल तक उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया.

फिर शांत स्वर में बोले—

जब समय आएगा.

तब बताऊँगा।

बस इतना कहकर वे फिर अपने काम में लग गए.

आर्यन ने आगे कुछ नहीं पूछा.

वह जानता था.

अगर पिता ने कहा है कि समय आने पर बताएँगे.

तो एक दिन जरूर बताएँगे.

सूर्य अब धीरे- धीरे पहाडों के पीछे छिपने लगा था.

आर्यन घर की छत पर बैठा दूर आकाश को देख रहा था.

उसे पहली बार महसूस हुआ.

दुनिया शायद उसके गाँव से कहीं ज्यादा बडी है.

मार्शल योद्धा.

आर्टिफैक्ट रिफाइनर.

दूर- दराज के राज्य.

और न जाने कितने रहस्य.

उसने अपनी मुट्ठी कस ली.

एक दिन.

मैं इस दुनिया को अपनी आँखों से देखूँगा।

उसे नहीं पता था.

कि उसी क्षण.

दूर पहाड की चोटी पर खडा वही सफेद वस्त्रधारी वृद्ध उसे देख रहा था.

वृद्ध के चेहरे पर संतोष की हल्की मुस्कान थी.

उन्होंने धीमे स्वर में कहा—

जिज्ञासा. यही पहला कदम है।

और अगले ही पल.

वे शाम की धुंध में विलीन हो गए.

संध्या पूरी तरह उतर चुकी थी.

अरण्यपुर के हर घर के बाहर मिट्टी के दीपक जल उठे थे. हवा में रातरानी की हल्की- सी सुगंध घुल गई थी. दूर मंदिर की घंटी की मधुर ध्वनि पूरे गाँव में फैल रही थी.

दिनभर की भागदौड के बाद अब गाँव शांत होने लगा था.

वीरेंद्र ने भट्ठी की आग धीरे- धीरे बुझा दी.

उन्होंने अपने हाथों से राख हटाई और लोहे के औजार करीने से रख दिए.

उनके लिए हर औजार केवल सामान नहीं था.

वह किसी किसान की उम्मीद था.

किसी लकडहारे की रोजी थी.

किसी परिवार का सहारा था.

घर के भीतर सरस्वती ने भोजन परोस दिया.

मिट्टी की थालियों में गरम रोटियाँ, दाल, जंगल से लाई गई सब्जियाँ और ताजा मट्ठा रखा था.

तीनों एक साथ बैठ गए.

वीरेंद्र का नियम था—

भोजन के समय कोई जल्दी नहीं करेगा।

कुछ देर तक केवल चूल्हे की लकडियों की आवाज सुनाई देती रही.

फिर सरस्वती ने मुस्कुराकर पूछा,

आज बाजार कैसा था?

आर्यन ने पूरे उत्साह से सब कुछ बताना शुरू किया.

व्यापारी.

नई तलवार.

दूर के राज्य.

और वह नया शब्द—

आर्टिफैक्ट रिफाइनर.

वीरेंद्र चुपचाप सुनते रहे.

सरस्वती ने मुस्कुराते हुए कहा,

दुनिया देखने की इच्छा अच्छी है.

लेकिन पहले खुद को इतना योग्य बनाओ कि दुनिया भी तुम्हें देखना चाहे।

आर्यन ने माँ की बात मन में बसा ली.

भोजन के बाद पूरा गाँव सोने की तैयारी करने लगा.

लेकिन आर्यन की दिनचर्या अभी पूरी नहीं हुई थी.

उसने घर के पीछे रखा अपना पुराना लकडी का अभ्यास- तलवार उठाया.

यह तलवार वीरेंद्र ने उसके दसवें जन्मदिन पर बनाई थी.

उस पर आज भी हल्की- सी लिखावट थी—

अभ्यास से ही सिद्धि।

आर्यन धीरे- धीरे गाँव के बाहर पुराने बरगद के पेड तक पहुँचा.

यही उसकी अभ्यास- स्थली थी.

कोई गुरु नहीं.

कोई शिष्य नहीं.

सिर्फ वह.

और रात की शांति.

उसने गहरी साँस ली.

पहला वार.

दूसरा.

तीसरा.

धीरे- धीरे उसकी हर हरकत लय में बदल गई.

वह किसी प्रसिद्ध तलवार कला का अभ्यास नहीं कर रहा था.

वह बस अपने शरीर को समझने की कोशिश कर रहा था.

कब पैर आगे बढाना है.

कब पीछे हटना है.

कब संतुलन बनाए रखना है.

बरगद से कुछ दूरी पर.

घने अँधेरे में.

कोई खडा था.

वही सफेद वस्त्रधारी वृद्ध.

वे बिना कोई आवाज किए आर्यन का अभ्यास देख रहे थे.

कुछ देर बाद उन्होंने धीमे से सिर हिलाया.

वार साधारण हैं.

लेकिन आधार सही है।

उन्होंने मुस्कुराकर कहा,

जिसने किसी गुरु से नहीं सीखा.

उसके लिए यह बहुत अच्छा है।

उन्होंने अपनी हथेली खोली.

उसमें एक छोटी- सी पारदर्शी क्रिस्टल जैसी वस्तु थी.

क्रिस्टल कुछ क्षणों के लिए हल्का- सा चमका.

फिर शांत हो गया.

वृद्ध ने संतोष की साँस ली.

अभी समय नहीं आया।

उसे अपने पैरों पर चलना सीखने दो।

और वे चुपचाप वहाँ से चले गए.

आर्यन को उनकी उपस्थिति का आभास तक नहीं हुआ

अभ्यास समाप्त करके आर्यन घास पर लेट गया.

ऊपर अनगिनत तारे चमक रहे थे.

उसने बचपन से यही आकाश देखा था.

लेकिन आज पहली बार उसे लगा.

शायद उन तारों के पार भी कोई दुनिया होगी.

उसने धीरे से स्वयं से कहा—

अगर सच में दुनिया इतनी बडी है.

तो मैं एक दिन उसे देखूँगा।

मैं केवल अरण्यपुर का लोहार नहीं बनूँगा.

मैं सबसे अच्छा लोहार बनूँगा।

कुछ पल रुककर वह मुस्कुराया.

और अगर सच में मार्शल योद्धा होते हैं.

तो मैं उनसे भी सीखूँगा।

यह कोई बडी शपथ नहीं थी.

न ही किसी देवता के सामने लिया गया वचन.

यह एक सोलह वर्ष के लडके का साधारण सपना था.

लेकिन.

कभी- कभी इतिहास की सबसे बडी कहानियाँ.

इन्हीं साधारण सपनों से जन्म लेती हैं.

उसी रात.

अरण्यपुर से बहुत दूर.

बर्फ से ढकी एक ऊँची पर्वत- चोटी पर.

एक विशाल प्राचीन मंदिर के भीतर.

पत्थर की दीवार पर जडा हुआ एक छोटा- सा नीला रत्न.

अचानक.

एक पल के लिए चमक उठा.

मंदिर के भीतर बैठे एक अज्ञात वृद्ध ने तुरंत अपनी आँखें खोलीं.

उन्होंने उस रत्न की ओर देखा.

फिर धीमे स्वर में कहा—

एक नई यात्रा. शुरू हो चुकी है।

उन्होंने न किसी का नाम लिया.

न किसी स्थान का.

और अगले ही क्षण.

वह नीली रोशनी फिर से शांत हो गई.

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