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Chapter 1

Mafiya boss - Chapter 1

Mafiya boss

अध्याय 1 – गलत गवाह

बारिश ने बक्सर की सड़कों को काले कांच की तरह चमका दिया था। रात की नमी हवा में तैर रही थी, और हर बूंद जैसे शहर की खामोशी को चीरती जा रही थी। दिव्या यादव ने आर्ट गैलरी से बाहर कदम रखा, उनके हील्स की आवाज़ सुनसान सड़क पर गूंज रही थी। उन्होंने अपना ऊनी कोट कसकर लपेटा, लेकिन ठंड उनके भीतर तक समा गई थी—एक अजीब बेचैनी के साथ। यह सड़क आमतौर पर इस समय खाली रहती थी। लेकिन आज कुछ अलग था। कुछ ऐसा जो उनकी त्वचा के नीचे सरकता जा रहा था।

एक इंजन की धीमी गुर्राहट ने बारिश की रफ्तार को चीर दिया। दिव्या ठिठक गईं। एक चमचमाती काली मासेराटी फुटपाथ के पास आकर रुकी, जिसकी हेडलाइट्स ने गीली सड़क पर रोशनी की धारियाँ बिखेर दीं। यह वही कार थी जिसकी कीमत उनके पूरे अपार्टमेंट से कहीं ज़्यादा थी। उनका दिल तेज़ धड़कने लगा।

पैसेंजर दरवाज़ा खुला। एक आदमी उतरा—लंबा, चौड़े कंधों वाला, उसका काला कोट इतनी सफ़ाई से सिला हुआ था कि जैसे उसके शरीर पर ढला हो। उसकी कलाई से झांकती चांदी की घड़ी उसकी हैसियत की गवाही दे रही थी। दौलत सिर्फ़ उसके कपड़ों या कार में नहीं थी—वो तो उसके पूरे वजूद से झलक रही थी। बक्सर में हर कोई दीपक मौर्य, कुख्यात मौर्य अपराध साम्राज्य के उत्तराधिकारी, के बारे में फुसफुसाता था। दिव्या ने उसे कभी नहीं देखा था, लेकिन उसकी ख्याति सुनी थी—निर्भीक, घातक, और बेहद सटीक। और आज, बारिश में खड़ा वह व्यक्ति ठीक वैसा ही लग रहा था जैसा लोग कहते थे—अप्राप्य।

एक और आदमी उसके पीछे लड़खड़ाता हुआ उतरा, हाथ उठाए, तेज़ी से हिंदी में मिन्नतें करता हुआ। उसकी आवाज़ में डर था, और आँखों में विनती।

"बस," दीपक की आवाज़ बारिश में भी साफ़ सुनाई दी। शांत, नपी-तुली, लेकिन जीवन और मृत्यु का फ़ैसला करने वाली।

एक दबा हुआ गोली की आवाज़ गूंजी, बारिश की आवाज़ के बीच भी चौंकाने वाली। वह आदमी चुपचाप पानी में गिर पड़ा। दिव्या की साँस अटक गई। उनके शरीर ने जैसे काम करना बंद कर दिया हो।

दीपक ने हल्का सा सिर घुमाया, जैसे उसे सड़क पार से उसकी मौजूदगी का आभास हो गया हो। उसकी गहरी आँखें दिव्या से मिलीं—ठंडी, परखती हुई, और किसी की जान लेने के बाद भी अजीब तरह से शांत।

एक पल के लिए, पूरी दुनिया थम गई। बारिश ने सब कुछ धुंधला कर दिया, सिवाय उन आँखों के। फिर उसने सिर हल्का सा झुकाया, एक शिकारी की तरह, जिससे दिव्या की रूह काँप उठी।

"जिज्ञासा," उसने मखमली आवाज़ में कहा, "तुम्हें मरवा सकती है।"

मासेराटी का दरवाज़ा फिर खुला। दिव्या कुछ सोच पातीं, इससे पहले ही वह उसकी ओर बढ़ चला। उनके पैर कांपने लगे। बारिश, खतरा, बारूद और चमड़े की गंध—सब कुछ एक साथ डरावना और मोहक था।

वह कुछ कदम दूर आकर रुका, इतना पास कि दिव्या उसकी ठुड्डी पर हल्का सा निशान और उसकी मुस्कान की झलक देख सकीं—जो उसकी आँखों तक नहीं पहुँची।

"तुम्हें यहाँ नहीं होना चाहिए था," उसने जैसे खुद से कहा।

"मैं—मैं जा रही हूँ," दिव्या ने कांपती आवाज़ में कहा और एक कदम पीछे हट गईं।

उसने हाथ उठाया, एक इशारा जो चेतावनी भी था और निमंत्रण भी। "तुमने बहुत कुछ देख लिया है। तुम जा सकती हो... या मेरे साथ चल सकती हो। चुनाव तुम्हारा है, दिव्या यादव।"

उनका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। हर भावना कह रही थी कि भागो, लेकिन उसके अंदाज़, उसकी चुपचाप हावी होती मौजूदगी ने उन्हें जड़ कर दिया।

बिजली चमकी, उसके चेहरे की तीखी रेखाओं को उजागर करती हुई। दिव्या सिहर उठीं—आधा ठंड से, आधा उस रहस्यमयी खिंचाव से जो वह महसूस कर रही थीं।

"तुम नहीं समझोगी," उन्होंने फुसफुसाया।

"मैं समझता हूँ," उसने नरम स्वर में कहा, लगभग दयालुता से। फिर शिकारी की आत्मविश्वास भरी आवाज़ में: "और आज रात, तुम मेरी हिफ़ाज़त में हो—चाहे तुम्हें पसंद हो या नहीं।"

बारिश से भीगी सड़क अंतहीन लग रही थी। दूर कहीं सायरन की आवाज़ गूंज रही थी। दिव्या का दिमाग़ घूम रहा था। एक गलत कदम, एक गलत नज़र, और सब कुछ खत्म हो सकता था—लेकिन वो जानती थीं, वो अभी पीछे नहीं हटेंगी। नहीं अभी।

मासेराटी का इंजन फिर से गूंजा। दीपक और पास आया, उसकी मौजूदगी रात की तरह उन्हें घेरने लगी। एक शिकारी और एक वादा—एक साथ।

तूफ़ान जारी रहा, और बक्सर शहर को खबर तक नहीं थी कि उसकी अंधेरी गलियों में एक जानलेवा नृत्य शुरू हो चुका था।

बारिश की हल्की फुहारें दिव्या यादव के गालों से टकरा रही थीं, जब वह अजनबी धीरे-धीरे, ठहरे हुए कदमों से उसकी ओर बढ़ा। पीछे खड़ी मासेराटी का इंजन धीमे स्वर में गूंज रहा था, उसकी हेडलाइट्स कोहरे को चीरती हुई दो भालों की तरह चमक रही थीं।

“रुको,” दिव्या ने चेताया, हालांकि उसकी आवाज़ बारिश की रिमझिम में खो सी गई।

वह रुक गया, इतना पास कि उसके कोट की गर्माहट दिव्या की बांह से छू गई। पास से वह महंगे इत्र की खुशबू में लिपटा था, जिसमें धुएं और बारूद की हल्की सी गंध भी थी—एक अजीब मिश्रण, जो असहज भी था और रहस्यमयी रूप से आकर्षक भी। दिव्या ने उसकी कलाई पर झांकती चांदी की घड़ी देखी—साधारण लेकिन बेशकीमती, शायद उससे कहीं ज़्यादा जितना वह एक साल में कमाती थीं।

“नाम?” उसने पूछा, उसकी गहरी आँखें दिव्या पर टिकी थीं, जैसे वह कोई पहेली हल करना चाहता हो।

दिव्या ने सिर हिलाया और पीछे हट गई। “दूर रहो।”

उसके होंठों पर एक हल्की मुस्कान उभरी, इतनी हल्की कि दिव्या का दिल एक पल को थम गया। “तेज़ मिज़ाज। मुझे पसंद है।” इससे पहले कि दिव्या कुछ कर पाती, उसने बिजली की गति से उसका फ़ोन छीन लिया। दिव्या की आँखें फैल गईं, और उसने स्वाभाविक रूप से उसे वापस लेने की कोशिश की। लेकिन फ़ोन उसकी कोट की अंदरूनी जेब में गायब हो चुका था।

“पुलिस को कॉल करना… समझदारी नहीं होगी,” उसने सहजता से कहा।

दिव्या का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। “तुमने किसी को गोली मार दी!”

“सुधार,” उसने हल्के, लगभग चुटीले स्वर में कहा, “मैंने एक समस्या का अंत किया। बड़ा फर्क है।”

झटका उसे वहीं जड़ कर गया, लेकिन उसके भीतर एक अजीब सी गर्मी उठने लगी थी—डर, अविश्वास और कुछ ऐसा जिसे वह नाम देना नहीं चाहती थीं। उसकी नज़रें दिव्या से जुड़ी थीं—शांत, लेकिन बिजली सी चमकती हुई।

“मेरे साथ चलो,” उसने आखिरकार कहा।

“नहीं,” दिव्या ने दृढ़ता से जवाब दिया।

उसने कार की ओर सिर हिलाया। “तुमने बहुत कुछ देख लिया है। या तो अभी मेरे साथ चलो, या फिर यहीं बारिश में तुम्हारे भविष्य पर बात करें। चुनाव तुम्हारा है, दिव्या।” हर भावना कह रही थी कि भागो। लेकिन मासेराटी का पिछला दरवाज़ा खुल गया, जैसे वह उसका इंतज़ार कर रहा हो। उसके पैर खुद-ब-खुद आगे बढ़ गए—जिज्ञासा से, और किसी गहरे, अनजाने खिंचाव से—एक ऐसा एहसास जो कह रहा था कि अब कोई विकल्प नहीं बचा।

कार के अंदर की खुशबू चमड़े और ताकत की थी: मुलायम सीटें, सुनहरे किनारे, और पुरानी व्हिस्की की हल्की सी महक। दीपक मौर्य —अब वह निश्चित थीं कि वही था—उसके पास आकर बैठ गया, उसकी मौजूदगी जैसे कार के भीतर एक और धड़कन बन गई।

“शांत हो जाओ,” उसने सहजता से कहा, जैसे कार आगे बढ़ी। “अगर मैं तुम्हें मारना चाहता, तो हम ये बातचीत नहीं कर रहे होते।”

“बहुत दिलासा देने वाला है,” दिव्या ने तंज में कहा, दरवाज़े की हैंडल को कसकर पकड़ते हुए, जैसे वही उसकी आख़िरी उम्मीद हो।

वह हल्के से हँसा, एक गूंजती हुई आवाज़ जो कार के भीतर फैल गई। “बताओ, दिव्या यादव —”

दिव्या उसकी ओर झपट पड़ीं, आवाज़ काँपती हुई। “तुम मेरा नाम कैसे जानते हो?”

“वो मेरा काम है,” उसने जवाब दिया, उसकी आँखों में मज़ाक और कुछ और चमक रहा था जिसे दिव्या समझ नहीं सकीं। “और अब, शायद तुम भी।”

बक्सर की रोशनियाँ खिड़की से गुजरती रहीं, बारिश से भीगी सड़कों पर नीयन रंगों की परछाइयाँ उछलती रहीं, जो उसके चेहरे पर टूटे हुए रंगों की तरह पड़ रही थीं। उनके बीच खामोशी थी—गहरी और भारी। वह उसे देख रहा था, जैसे हर हावभाव, हर अनजानी प्रतिक्रिया को दर्ज कर रहा हो।

“तुम काँप रही हो,” उसने कहा, आवाज़ धीमी और चिढ़ाने वाली।

“मैं नहीं काँप रही,” दिव्या ने विरोध किया, हालांकि उनके दाँत हल्के से बज रहे थे।

वह थोड़ा और झुका, उसकी खुशबू—देवदार की लकड़ी और कुछ और गहरा—दिव्या की साँसों में घुलने लगी।

“झूठ,” उसने कहा।

दिव्या की साँस अटक गई। बाहर की दुनिया—तूफ़ान, खाली सड़कें, वो शहर जो कभी इतना बड़ा नहीं लगा था—अब दूर लग रही थी, जैसे कोई सपना। अब सिर्फ़ वही था, और उसकी रहस्यमयी खिंचाव।

दीपक की मुस्कान फिर लौटी—धीमी, जानबूझकर, और तबाही जैसी। “चिंता मत करो, दिव्या। तुम जल्द ही सब समझ जाओगी। आज रात, तुम मेरी हिफ़ाज़त में हो…चाहे तुम्हें पसंद हो या नहीं।”

और पहली बार, जब से वह बारिश में भीगी उस सड़क पर कदम रखी थीं, दिव्या यादव को एक अजीब, लेकिन अटल यक़ीन हुआ—वह अब सिर्फ़ एक राहगीर नहीं थीं। वह अब उस अंधेरे खेल का हिस्सा थीं, जो बक्सर की गलियों में बहुत गहराई तक फैला हुआ था। एक ऐसा खेल, जो जितना रहस्यमयी था, उतना ही ख़तरनाक।

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