Mafiya boss - Chapter 2
Mafiya bossमखमली पिंजरा
लिफ्ट धीरे-धीरे गुनगुनाती हुई दिव्या यादव को मौर्य टॉवर की सबसे ऊपरी मंज़िल की ओर ले जा रही थी। हर मंज़िल का नंबर एक-एक कर चमकता गया: चालीस... पचास... साठ... जब तक दरवाज़े नहीं खुल गए और उसके सामने एक ऐसी दुनिया नहीं खुल गई जो किसी सपने जैसी लग रही थी। पेंटहाउस उसके सामने फैला हुआ था, हर सतह एक ठंडी परिपूर्णता के साथ चमक रही थी। फर्श से छत तक की खिड़कियाँ पूरे कमरे को बक्सर की रात की रोशनी में लपेटे हुए थीं, और नीचे की बत्तियाँ मानो ज़मीन पर बिखरे तारों की तरह चमक रही थीं।
वह धीरे से अंदर कदम रखती है, उसकी एड़ी की हल्की खटखट संगमरमर पर दब जाती है, जो कमरे की विशालता में लगभग खो जाती है। उसके भीगे बाल चेहरे से चिपके हुए थे, और बारिश व शहर की सड़कों की गंध, देवदार, चमड़े और हल्के इत्र की खुशबू के साथ अजीब तरह से घुलमिल गई थी।
"जूते," दीपक मौर्य ने हल्के स्वर में कहा, अपना बारिश से भीगा कोट उतारते हुए।
दिव्या चौंकी। "माफ़ कीजिए?"
"दरवाज़े के पास छोड़ दो। फर्श इटली से मंगवाया गया कलाकट्टा संगमरमर है। मुझे खरोंचें पसंद नहीं हैं।" उसकी आवाज़ में कोई कठोरता नहीं थी, लेकिन हर शब्द में ऐसा अधिकार था जो बिना ऊँची आवाज़ किए आज्ञा का पालन करवाता था।
वह बार की ओर बढ़ा और खुद के लिए गहरे एम्बर रंग की शराब उंडेल ली। उसकी हर हरकत में एक सहज आत्मविश्वास था, जैसे वह उस जीवन में पूरी तरह से रमा हुआ हो, जिसकी दिव्या केवल कल्पना कर सकती थी। वह थोड़ी देर ठिठकी, चारों ओर देखा—चमचमाता पियानो, दीवारों पर कलाकृतियाँ, और हवा में बसी पुरानी दौलत और ताकत की महक।
"मैं यहाँ नहीं रुकने वाली," उसने आखिरकार कहा, साहस जुटाते हुए।
"कितना प्यारा है," उसने मुस्कराते हुए कहा और उसे व्हिस्की की जगह एक गिलास पानी थमा दिया। "लेकिन तुम भीगी हुई हो, काँप रही हो... और मुझे कुछ सवाल पूछने हैं।"
"मैं तुम्हें कुछ नहीं देती।"
वह मुस्कराया—एक ऐसी मुस्कान जो निमंत्रण भी हो सकती थी और चेतावनी भी। "शायद नहीं। लेकिन तुमने कुछ ऐसा देखा है... जो संवेदनशील है। अब तुम मेरे संसार का हिस्सा हो, दिव्या यादव।" उसका दिल ज़ोर से धड़क उठा। उसे अचानक एहसास हुआ कि वह यहाँ से कैसे जाएगी—या क्या वह जाना भी चाहती है?
"तुम्हें मेरा नाम कैसे पता?" उसने संदेह से पूछा।
"बिलकुल," उसने कहा, उसकी आँखों में एक चमक थी जो उसके सीने को कसने लगी। "तुम्हें क्या लगता है, मैं किसी अजनबी को अपने घर ले आता?"
उसने निगलते हुए चारों ओर देखा—कमरे की विशालता, उसकी शांति में छिपी शक्ति, और दीपक से आती देवदार और धुएँ की हल्की महक। अब उसने कुछ और बातें नोट कीं: उसकी कलाई पर चमकते कफ़लिंक, उसके सूट की धारियाँ इतनी तीखी जैसे अंधेरे से तराशी गई हों, और उसके जबड़े के कोने पर एक हल्का सा निशान जो उसकी परिपूर्णता में एक रहस्यमय खतरे की झलक जोड़ता था।
"अब क्या होगा?" उसने अपनी आवाज़ को स्थिर रखने की कोशिश करते हुए पूछा।
"सरल है," वह उसके करीब आया, उसकी उपस्थिति कमरे में एक ठोस भार की तरह भर गई। "तुम यहीं रहोगी जब तक मुझे यकीन न हो जाए कि तुम कुछ नहीं कहोगी।"
"तो मैं क़ैदी हूँ," उसने बुदबुदाया, हालाँकि उसकी आवाज़ में अविश्वास था।
"मेहमान," उसने सुधारा, लेकिन उसकी आँखों की तीव्रता ज़रा भी कम नहीं हुई। "एक बहुत ही सुरक्षित मेहमान।"
बाहर, बक्सर के ऊपर बिजली कड़क रही थी। अंदर, उनके बीच की हवा इतनी भारी हो गई थी कि वह उसके सीने पर बोझ बनकर बैठ गई। उसे अपना दिल धड़कता सुनाई दे रहा था—तेज़, असमान, उसकी घबराहट को उजागर करता हुआ।
"और अगर मैंने मना कर दिया?" उसने पूछा, उसकी आवाज़ में एक हल्का कंपन था।
वह उसके बेहद करीब आ गया, लेकिन छुआ नहीं। देवदार और धुएँ की महक उसके होशों को घेरने लगी। "तो," उसने धीरे से कहा, "हम कोई और इंतज़ाम कर लेंगे। लेकिन मुझे नहीं लगता कि तुम मना करोगी।"
एक पल के लिए, दोनों स्थिर खड़े रहे। बाहर की आँधी अब एक दूर की गूंज बन गई थी, जबकि उनके बीच एक और तूफ़ान उठ खड़ा हुआ था। दिव्या खुद को फँसा हुआ, बेपर्दा और किसी अजीब सी जीवंतता से भरा हुआ महसूस कर रही थी, जैसा उसने पहले कभी नहीं किया था। हर भावना उसे भागने को कह रही थी, लेकिन उसके शरीर का हर रेशा इस खतरनाक सच्चाई को पहचान रहा था: दीपक मौर्य अब उसकी दुनिया का केंद्र बन चुका था—चाहे अच्छा हो या बुरा।
सुबह की धूप चमकदार संगमरमर की फर्श पर फैल रही थी, हर महीन रेखा और दरार को उजागर करती हुई, जब दिव्या यादव की नींद टूटी। वह एक ऐसे सोफ़े पर थी जिसकी कीमत शायद उसकी पूरी कार से ज़्यादा थी। नीचे बक्सर शहर एक रोशनी से भरे गलीचे की तरह फैला था, और ऊँची इमारतों के नीचे सुबह के यात्री चींटियों की तरह रेंगते दिख रहे थे। थकान से उसका सिर थोड़ा भारी था, लेकिन उसकी नसों में अब भी ऐड्रेनालिन दौड़ रहा था।
बर्तनों की हल्की खनक ने उसका ध्यान रसोई की ओर खींचा। वहाँ, एक तीखी नाक-नक्श वाली महिला शांत दक्षता के साथ अंडे और टोस्ट प्लेट में सजा रही थी।
"तुम जाग गई," महिला ने बिना मुड़े कहा, उसकी आवाज़ शांत और सटीक थी। "अच्छा है। नाश्ता करो।"
दिव्या ने पलकें झपकाईं, समझ नहीं पाई कि क्या कहे। "आप... आप कौन हैं?"
"रिया," उसने सहजता से जवाब दिया। "घर की देखरेख करती हूँ। बहस मत करना—मैंने पहले ही दीपक से कह दिया है कि तुम्हें खाना चाहिए।"
दिव्या कुछ कहती, उससे पहले ही एक दूसरा शख्स अंदर आया। लंबा, छरहरा, और बेजोड़ ढंग से तैयार, उसके हाथ में एक मोटी चमड़े की फाइल थी जिसमें तनाव जैसे बंद था।
"सुप्रभात, राजकुमारी," उसने हल्के अंदाज़ में कहा, होंठों पर एक हल्की मुस्कान। "मैं हूँ मनीष, दीपक का सलाहकार। समझो, मैं वो हूँ जो गड़बड़ियाँ साफ करता है।"
"सलाहकार?" दिव्या ने दोहराया।
"सलाहकार। वकील। कभी-कभी चमत्कारी समाधानकर्ता," मनीष ने कहा, फाइल काउंटर पर रखते हुए। उसकी गहरी आँखें उसे सतर्कता से देख रही थीं—जिज्ञासु, परखती हुई। "तो, तुम हो वो गवाह।"
"मर्जी से नहीं," उसने बुदबुदाते हुए कहा, भीगे बालों की एक लट कान के पीछे सरकाते हुए।
पीछे का दरवाज़ा खुला और दीपक मौर्य अंदर आया। नहाकर ताज़ा, उसका चारकोल रंग का सूट उसके शरीर से ऐसे चिपका था जैसे दूसरी त्वचा हो। उसके हर हावभाव में नियंत्रण, ताकत और खतरे की झलक थी।
"अच्छा," उसने मनीष की ओर देखते हुए कहा। "काम है।"
मनीष ने फाइल पर हल्की थाप दी। "यादव परिवार कल रात की घटना के बाद कुछ ज़्यादा ही दिलचस्पी दिखा रहा है। खबर है कि वो मुलाकात चाहते हैं।"
दिव्या सिहर गई। "मेरा परिवार?"
दीपक की नज़र उस पर गई, लेकिन चेहरा पढ़ा नहीं जा सका। "लगता है उन्हें चिंता है कि तुम घर नहीं लौटी।"
"वो पुलिस को बुलाएँगे," उसने सतर्कता से कहा।
"नहीं बुलाएँगे," उसने सपाट स्वर में कहा। "तुम्हारे पापा जानते हैं मैं कौन हूँ। वो जंग का खतरा नहीं उठाएँगे।"
मनीष ने भौंहें उठाईं। "फिर भी, ये ध्यान आकर्षित कर रहा है—जो हमें नहीं चाहिए।"
दीपक ने खुद के लिए कॉफी डाली, उसकी हर हरकत सटीक थी। "देख लो इसे।"
मनीष ने सिर हिलाया और चला गया, जाते-जाते दिव्या को एक उड़ती नज़र से देखा—एक ऐसी नज़र जो कह रही थी कि अब वह एक अजीब लेकिन बेहद अहम मोहरा बन चुकी है एक खतरनाक खेल में।
रिया ने फिर से उसके सामने प्लेट रख दी। "खा लो," उसने धीरे से कहा और फिर गलियारे में गायब हो गई।
अकेली बैठी दिव्या ने पेंटहाउस की विशालता और अपनी स्थिति की सच्चाई पर विचार किया। उसके परिवार की चिंता, माफिया की अंधेरी दुनिया, दीपक की मौन शक्ति—सब कुछ बहुत भारी लग रहा था। उसका दिल तेज़ी से धड़क रहा था, डर और विस्मय के बीच झूलता हुआ।
दीपक काउंटर से टिककर उसे उसी शांत, अस्थिर कर देने वाली नज़र से देख रहा था जो हमेशा उसके साथ रहती थी। "देखा?" उसने धीरे से कहा। "अब तुम सिर्फ एक रात का हिस्सा नहीं हो। अब तुम कुछ बड़े का हिस्सा हो।"
दिव्या ने प्लेट को किनारे कर दिया, भूख जैसे कहीं गायब हो गई थी। "मैं नहीं चाहती।"
"अफसोस," दीपक ने कहा, उसकी आँखें गहरी और स्थिर थीं, "चाहना अब मायने नहीं रखता।"
धूप कमरे में तिरछी होकर गिर रही थी, लेकिन वह उस सच्चाई को रोशन नहीं कर सकी जो दिव्या अब समझ रही थी: दीपक मौर्य की दुनिया में सुरक्षा और खतरा एक ही साँस में रहते हैं, और वह पहले ही उस रेखा को पार कर चुकी थी—जहाँ वह केवल एक दर्शक नहीं रही थी, बल्कि अब इस खेल की खिलाड़ी बन चुकी थी। हर नज़र, हर शब्द, हर साँस अब उस खेल का हिस्सा थी जिसे उसने कभी खेलने की इच्छा नहीं की थी—और जिसे जीतना शायद उसके बस में नहीं था।