Mafiya boss - Chapter 3
Mafiya bossसंदेश और चेतावनियाँ
दिव्या यादव की नींद ऊँची एड़ी की सैंडल की धीमी, सधी हुई खटखटाहट से खुली, जो संगमरमर की फर्श पर गूंज रही थी। एक पल के लिए वह भूल गई कि वह कहाँ है—उसके नीचे का सोफा मक्खन जैसा मुलायम था, और हवा में कॉफी और पॉलिश की हुई लकड़ी की हल्की खुशबू तैर रही थी। फिर हकीकत लौट आई: बारिश, गोली की आवाज़, और दीपक मौर्य की गहरी, प्रभावशाली मौजूदगी।
एक लंबी महिला, लाल रंग की ट्रेंच कोट में, आत्मविश्वास से लिविंग रूम पार कर रही थी, जैसे वह इस जगह की मालिक हो। उसकी एड़ियों की आवाज़ संगमरमर पर एक लय में पड़ रही थी।
"तुम जाग गई," उस अजनबी ने कहा, उसकी आवाज़ में हल्की मुस्कान की झलक थी। "अच्छा हुआ, मुझे जगाने की ज़हमत नहीं उठानी पड़ी।"
दिव्या उठ बैठी, और कंबल को अपने करीब खींच लिया। "आप कौन हैं?"
महिला के गहरे लाल होंठों पर एक हल्की मुस्कान उभरी। "सोनम अग्रवाल। मैं दीपक के लिए खास संदेश पहुँचाती हूँ। और तुम वही गवाह हो, है न?"
दिव्या कुछ कह पाती, उससे पहले ही दीपक मौर्य हॉलवे से प्रकट हुए, एक चारकोल रंग के सिलवाए हुए सूट में, जो किसी फैशन मैगज़ीन के कवर पर छप सकता था। एक हाथ में फोन था, और दूसरे से उसकी खुशबू हवा में घुल रही थी।
"सोनम," उसने कहा, उसका लहजा अभिवादन से ज़्यादा आदेश जैसा था।
सोनम ने एक सीलबंद लिफाफा काउंटर पर रखा, अपनी सुंदर उंगलियों से। "यादव परिवार के मुखिया का संदेश है। वे एक… बातचीत चाहते हैं।"
दीपक ने लिफाफा लिया, उसके हावभाव सधे हुए, लगभग किसी रस्म की तरह। उसने चुपचाप पढ़ा, फिर उसे सिंक में ले जाकर माचिस जलाई, और कागज़ राख में बदल गया।
"तुम कम से कम मुझे बता तो सकते थे कि उसमें क्या लिखा था," दिव्या ने नाराज़ होकर कहा।
"उसमें लिखा था कि तुम्हारा परिवार घबराया हुआ है," दीपक ने कहा, अपनी आस्तीन से राख झाड़ते हुए। "और पालतू जानवरों की तरह सोच रहा है। वे ऐसा नहीं कर सकते।"
सोनम की तेज़ नज़र कमरे में घूमी। "और भी है। खबर है कि सिंह परिवार तुम्हारे शिपमेंट डॉक की निगरानी कर रहा है। शायद वे तुम्हें देख रहे हैं।"
दीपक का जबड़ा कस गया, जो उसके गुस्से का एकमात्र संकेत था। "सुरक्षा दोगुनी कर दो। मेरी इजाज़त के बिना कोई भी टावर के पास नहीं आएगा।"
सोनम ने सिर झुकाया, और दिव्या की ओर देखा। "और गवाह?"
"वो यहीं रहेगी," दीपक ने सीधा जवाब दिया।
ये शब्द दिव्या को किसी बंद दरवाज़े जैसे लगे। "मैं यहीं खड़ी हूँ," उसने झुंझलाकर कहा। "कम से कम मुझसे बात तो करो, मेरे बारे में नहीं।"
सोनम हल्के से हँसी। "इसमें तो दम है।"
"बस," दीपक ने कहा, उसकी आँखों में हल्की सी मुस्कान की झलक थी। "तुम्हें जो आदेश दिए गए हैं, उनका पालन करो, सोनम।"
सोनम ने एक नपे-तुले अंदाज़ में मुड़कर लिफ्ट की ओर कदम बढ़ाए। दरवाज़े बंद होने से पहले उसने दिव्या की ओर एक नज़र डाली—जिसमें चेतावनी भी थी और जिज्ञासा भी—और फिर वह गायब हो गई।
कमरे में फिर सन्नाटा छा गया, जिसे सिर्फ़ बक्सर शहर की हल्की गूंज तोड़ रही थी। दिव्या ने अपने हाथ बाँध लिए, उस तनाव, उन धमकियों, और उस असंभव स्थिति को समझने की कोशिश करते हुए जिसमें वह फँस चुकी थी।
"तुमने मेरे पापा का खत जला दिया," उसने गुस्से से कहा।
"मैंने पढ़ लिया," दीपक ने कहा। "और इससे कुछ नहीं बदलता कि तुम्हें यहाँ रखना ही तुम्हारी ज़िंदगी की गारंटी है।"
"मेरे पापा पुलिस को बुलाएँगे।"
"तुम्हारे पापा जानते हैं मैं कौन हूँ," दीपक ने कहा, उसके करीब आकर। वह इतनी नज़दीक आ गया कि उसकी साँसों की गर्मी महसूस हो रही थी। उसकी आँखें स्थिर थीं, आवाज़ सख्त और अडिग। "वो ऐसी जंग नहीं छेड़ेंगे जो वो हार जाएँ।"
दिव्या की रीढ़ में एक सिहरन दौड़ गई—आधा डर, आधा कुछ और, जिसे वह नाम नहीं दे पाई। बाहर, बक्सर की सड़कों पर सायरन की आवाज़ें गूंज रही थीं। अंदर, दीपक मौर्य की दुनिया एक मखमली जाल की तरह उसके चारों ओर कसती जा रही थी। और पहली बार, उसे सिर्फ़ डर नहीं लगा—बल्कि कुछ और भी महसूस हुआ, कुछ ऐसा जो खतरनाक रूप से मोहक था।
दोपहर का आसमान बारिश की धमकी से भरा था जब दीपक दिव्या को एक प्राइवेट लिफ्ट की ओर ले गया, जिसे उसने पहले कभी नहीं देखा था। दरवाज़े चुपचाप खुले, अंदर स्टील की दीवारें और ठंडी रोशनी थी। एक फिंगरप्रिंट स्कैनर चमक रहा था, और दीपक के अंगूठे के स्पर्श से लिफ्ट ऊपर की ओर चल पड़ी।
"हम कहाँ जा रहे हैं?" दिव्या ने पूछा, उसके स्वर में संदेह और जिज्ञासा का मिश्रण था।
"तुम्हें नज़ारा दिखाने," दीपक ने कहा, उसकी आवाज़ शांत थी, लेकिन उसमें एक खतरनाक दृढ़ता थी। "और ये दिखाने कि मेरी इजाज़त के बिना कोई मेरे पास नहीं आ सकता।"
लिफ्ट ऊपर चढ़ती रही, उसकी मशीनरी की आवाज़ धीमी और स्थिर थी। दिव्या ने नंबरों को बढ़ते देखा, हर मंज़िल उसे शहर से और ऊपर ले जा रही थी। जब दरवाज़े खुले, तो हवा ने उसके चेहरे को छुआ, बारिश और बक्सर की खुशबू लिए हुए।
वे एक रूफटॉप हेलिपैड पर पहुँचे, जिसकी सतह पर हल्की फिसलन थी। शहर उनके नीचे फैला था—नीयन लाइट्स और स्टील की परतों में, दूर की ट्रैफिक की आवाज़ एक हल्की लोरी जैसी थी।
"ये तुम्हारा पिंजरा है," दिव्या ने धीरे से कहा, खुद को ठंड से बचाते हुए।
"मेरा किला," दीपक ने ठीक किया, हवा में खड़ा होकर। "एक किला खतरे को बाहर रखता है… और कभी-कभी लोगों को अंदर।"
दिव्या ने उसे संदेह से देखा। "क्या तुम हर उस इंसान को बंद कर देते हो जो तुम्हें परेशान करता है?"
"सिर्फ़ उन्हें जो क़ीमती होते हैं," उसने तीखे स्वर में कहा, उसकी गहरी आँखें दिव्या की आँखों से टकराईं। "तुम नहीं जानती कि कितने लोग तुम्हें गायब देखना चाहते हैं—सिर्फ़ इसलिए कि तुम गलत वक़्त पर गलत जगह थीं।"
वह कुछ कहने ही वाली थी, लेकिन उसकी आवाज़ में जो सच्चाई थी, उसने उसे चुप कर दिया। हवा शहर की आवाज़ों को ऊपर ला रही थी—सायरन, इंजन, और उस ज़िंदगी की गूंज, जिससे वह अब पूरी तरह जुड़ी नहीं थी।
दीपक और पास आया, उसका कोट दिव्या की बाँह से हल्के से छू गया—एक ऐसा स्पर्श जो आकस्मिक था, फिर भी जानबूझकर।
"सुरक्षित," उसने खुद से कहा। एक साधारण शब्द, लेकिन भारी अर्थों के साथ। "फिलहाल।"
दिव्या ने सिर उठाया, उसकी आँखों में झाँकते हुए पूछा, "किससे सुरक्षित? उनसे? या तुमसे?"
उसकी आँखों में एक पल के लिए नरमी आई, फिर वह फिर से कठोर हो गईं—अनकहे रहस्यों और असंभव सच्चाइयों से भरी हुई। "दोनों से," उसने स्वीकार किया। "बाहर की दुनिया बेरहम है, दिव्या। लेकिन ज़रूरत पड़ने पर मैं भी।"
हवा उनके चारों ओर घूम रही थी, उसके बाल और कपड़े उड़ाते हुए, जैसे बक्सर खुद उसे चेतावनी दे रहा हो कि वह किस नाज़ुक संतुलन पर खड़ी है। डर और आकर्षण, चिंता और चाहत
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