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Chapter 4

Mafiya boss - Chapter 4

Mafiya boss

परिवार की रेखाएँ

शाम होते-होते पेंटहाउस सुनहरी रोशनी में चमक रहा था, जिसकी झलकियाँ बक्सर शहर के नीचे हज़ारों टुकड़ों में बिखर रही थीं। दिव्या यादव फर्श से छत तक फैली खिड़कियों के पास खड़ी थी, नीचे की सड़कों को देख रही थी। ट्रैफिक की गूंज और दूर से आती सायरन की आवाज़ें उसे लगातार याद दिला रही थीं कि खतरा कभी नहीं सोता। हर परछाई, हर हलचल उसे बेचैन कर रही थी—एक अदृश्य दबाव जो उसकी नसों पर लगातार हावी था।

मार्को अंदर आया, उसके चमचमाते जूते संगमरमर पर फुसफुसाते हुए चल रहे थे। उसके हाथों में एक चमड़े का फोल्डर था, जो जैसे तनाव से भरा हुआ कंपन कर रहा था। उसकी गहरी आँखें दिव्या की ओर गईं—तेज़ और परखती हुईं—फिर दीपक मौर्य पर टिक गईं, उस सहजता के साथ जो किसी ऐसे व्यक्ति में होती है जिसे पता हो कि कितनी दूर तक जाना है और कहाँ रुकना है।

"तुम्हारे पापा ने मुलाकात के लिए हामी भर दी है," मार्को ने कहा, उसकी आवाज़ धीमी और नपी-तुली थी। "तटस्थ जगह पर। वो तुम्हें खुद देखना चाहते हैं… ये यकीन करना चाहते हैं कि तुम सुरक्षित हो।"

दिव्या की धड़कन तेज़ हो गई। "कब?"

"आज रात," मार्को ने जवाब दिया, फोल्डर खोलते हुए जिसमें नक्शे, तस्वीरें और एन्क्रिप्टेड संदेश थे। उसने एक पल के लिए दिव्या को देखा। "और वो एक प्रतिनिधि भेज रहे हैं। तुम अकेली नहीं रहोगी।"

दीपक मौर्य बिना आवाज़ किए उसके पीछे आ खड़ा हुआ, impeccably dressed, उसकी मौजूदगी चुंबकीय और शिकारी जैसी थी। वह बार के पास आराम से टिक गया, क्रिस्टल ग्लास में गहरे रंग की शराब को घुमाते हुए। "मेरे बिना नहीं," उसने कहा।

दिव्या का दिल एक पल को थम गया। वह बहस करना चाहती थी—ये कहना चाहती थी कि वह खुद को संभाल सकती है—लेकिन उसकी आँखों की शांत, अडिग शक्ति ने उसे वहीं रोक दिया।

"क्यों?" उसने पूछा।

"क्योंकि," दीपक ने धीरे से कहा, उसकी आवाज़ में आदेश की धार थी, "अगर आज रात कोई गलती करता है, तो मैं वहाँ रहना चाहता हूँ उसे ठीक करने के लिए।"

दिव्या ने निगल लिया। उसके शब्दों में वादा भी था और चेतावनी भी। वह समझ गई, एक ऐसी सिहरन के साथ जिसे वह नाम नहीं दे पाई, कि वह रक्षक भी था और खतरा भी। और वह कहीं विश्वास और डर के बीच फँसी हुई थी।

बाद में वे बक्सर के ऐतिहासिक इलाके में स्थित एक निजी क्लब पहुँचे। ऐसा स्थान जहाँ सुरक्षा चुपचाप मौजूद थी और पुरानी दौलत का प्रभाव हर कोने में महसूस होता था। झूमर चमकते हुए इंद्रधनुषी रोशनी फैला रहे थे, और धीमी बातचीतों व गिलासों की खनक से एक तनावपूर्ण संगीत सा बन रहा था।

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दिव्या ने अपने पापा को एक कोने की मेज़ पर बैठे देखा, उनके दोनों ओर दो भारी-भरकम आदमी थे जिनकी नज़रें दीपक से हट नहीं रही थीं। जब उन्होंने दिव्या को देखा, तो उनके कठोर चेहरे पर राहत की हल्की परत आ गई।

"दिव्या," उनके पापा ने धीरे से कहा। "तुम ठीक हो?"

"हाँ, पापा," उसने जवाब दिया, अपने स्वर में शांति लाने की कोशिश करते हुए, जबकि उसका पेट अंदर से मरोड़ रहा था।

दीपक की मौजूदगी उसके पास चुंबकीय थी, अस्थिर करने वाली, एक जीवित दीवार की तरह जो हर संभावित खतरे से उसे बचा रही थी। "वह मेरी सुरक्षा में रहेगी," उसने दृढ़ता से कहा, उसकी आँखें कमरे को सावधानी से स्कैन कर रही थीं।

उसके पापा की नज़रें दीपक को परख रही थीं, दोनों पुरुषों के बीच का तनाव धुंध की तरह गहरा था।

"कब तक?" उन्होंने पूछा।

"जब तक बक्सर सुरक्षित नहीं हो जाता," दीपक ने सपाट स्वर में कहा। "उसके लिए—और तुम्हारे लिए भी।"

एक सन्नाटा फैल गया, जिसे सिर्फ़ गिलासों की धीमी खनक और पास की मेज़ों से आती फुसफुसाहटें तोड़ रही थीं। उसके पापा ने धीरे से सिर हिलाया, उनकी आँखों में अनिच्छुक स्वीकृति थी: दीपक मौर्य ऐसा आदमी था जिसे आसानी से कोई टाल नहीं सकता, और अब दिव्या पूरी तरह से उसके प्रभाव में थी।

यह सच्चाई दिव्या के कंधों पर एक ऐसे बोझ की तरह बैठ गई जिसे वह उतार नहीं सकती थी। गठबंधन, ताकत, और खतरे अब सिर्फ़ कल्पना नहीं थे—वे सजीव थे, उसके चारों ओर साँस ले रहे थे। अब उसके हर कदम, हर नज़र का मतलब था। और दीपक… दीपक इस सबका केंद्र था।

उसने हल्के से उसकी ओर देखा, उसकी धड़कन तेज़ हो गई। उस शांत नज़र के आदान-प्रदान में उसने महसूस किया कि वह एक सीमा पार कर चुकी है। वह अब बाहर से देखने वाली नहीं थी—वह खेल का हिस्सा बन चुकी थी। और इस दुनिया के नियम खतरनाक थे, मोहक थे, और पूरी तरह से उसके थे।

दो रात बाद, बक्सर जैसे अपनी साँसें थामे खड़ा था। आसमान बिजली की चमक से झिलमिला रहा था। मौर्य पेंटहाउस की सुरक्षित ऊँचाई से दिव्या यादव विशाल खिड़कियों से बाहर देख रही थी, दूर के जलतट पर हल्की-हल्की रोशनी की चमकें किसी उथल-पुथल का संकेत दे रही थीं। गोलियों की आवाज़ गूंजी—तेज़, सटीक, और एक अजीब तरह की क्रूर रस्म की तरह। सिंह परिवार ने अपनी चाल चल दी थी।

दीपक मौर्य उसके पीछे आ खड़ा हुआ, उसका कोट बारिश से भीगा हुआ था, लेकिन उसकी मौजूदगी हमेशा की तरह शांत और प्रभावशाली थी। उसके शरीर से देवदार की हल्की खुशबू आ रही थी, जो बारिश और बिजली की गंध में घुल रही थी।

"वे चेतावनी देने आए थे," उसने धीमे, लगभग फुसफुसाते हुए कहा, "और उन्हें जवाब भी मिल गया।"

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दिव्या पलटी, उसकी आँखें चौड़ी हो गईं, दिल ज़ोर से धड़कने लगा। "तुम मारे जा सकते थे!"

दीपक ने उसे देखा, उसकी नज़र स्थिर थी, होंठों पर हल्की सी मुस्कान उभरी। "वे तेज़ नहीं थे। और तुम… तुम अब भी ज़िंदा हो क्योंकि मैंने तुम्हें यहाँ रखने का फ़ैसला किया।"

दिव्या ने मुश्किल से निगला, सीने में गर्मी की एक लहर दौड़ गई। "मैं कोई बच्ची नहीं हूँ," उसने कहा, हालांकि उसकी आवाज़ में घबराहट साफ़ झलक रही थी।

"नहीं," दीपक ने धीरे से सहमति जताई, "लेकिन तुम इंसान हो। और इंसान गलतियाँ करते हैं। मेरी दुनिया में गलतियों की माफ़ी नहीं होती।"

बाहर का तूफ़ान उसके भीतर की उथल-पुथल का प्रतिबिंब बन गया था। बारिश काँच पर लगातार गिर रही थी, शहर की सड़कों पर उछलती हुई, सायरनों की आवाज़ और हॉर्न की गूंज के साथ एक बेचैन लय बना रही थी। और फिर भी, इस तूफ़ान के बीच दीपक मौर्य एक स्थिर शक्ति था—अडिग, अचल, और अजेय।

वह और पास आया, संगमरमर पर उसके जूतों की हल्की खटखटाहट दिल की धड़कन जैसी गूंज रही थी। "क्या तुम समझती हो कि यहाँ होना क्या मायने रखता है, दिव्या?" उसका हाथ हल्के से उसके कोहनी पर टिका, उसे स्थिर करते हुए। "हर नज़र, हर फुसफुसाहट, हर छोटी सी हरकत संतुलन बिगाड़ सकती है। तुम्हारी ज़िंदगी… मेरी ज़िंदगी… हर मोड़ पर खतरे से जुड़ी है।"

दिव्या काँप गई—ठंड से नहीं, बल्कि उस पल की तीव्रता से। रोमांच, डर, और उत्तेजना—सब एक तीखे बिंदु पर आकर मिल गए थे।

"मुझे नहीं पता कि मैं ये कर पाऊँगी या नहीं," उसने फुसफुसाते हुए कहा।

दीपक की आँखों में एक पल के लिए नरमी आई, हालांकि शिकारी जैसी धार अब भी बनी रही। "तुम करोगी। तुम्हें करना होगा। क्योंकि तुम्हें ज़िंदा रहना है… मेरे लिए भी, तुम्हारे लिए भी।"

बाहर बारिश चाँदी और नीले रंग की धारियों में बदल गई थी, और दिव्या ने अपनी नई दुनिया की असंभव सच्चाई को महसूस किया। सिंह परिवार, यादव परिवार, खतरनाक गठबंधनों और दुश्मनी का जाल—अब ये सब कल्पना नहीं थे। वह अब इस खेल के केंद्र में थी, एक ऐसा मोहरा जिसे उसने कभी चलाना नहीं चाहा था।

दीपक ने उसे बालकनी की ओर बढ़ाया, उनके बीच की दूरी में एक अनकही खिंचाव था। रात की हवा नम थी, उसमें बिजली की गूंज थी, जो उसकी इंद्रियों को छू रही थी। उसने दीपक की ओर देखा—उस आदमी की ओर जो अब उसका रक्षक भी था और उसका खतरा भी—और एक झटके में समझ गई कि उसका डर अब कुछ और बन चुका है। कुछ खतरनाक। कुछ नशे जैसा।

"तुम सुरक्षित हो," उसने कहा, उसकी आवाज़ मुलायम लेकिन दृढ़ थी, और उसने दिव्या के भीगे बालों की एक लट को उसके कान के पीछे सरकाया। "फिलहाल। लेकिन ये जान लो—बाहर की दुनिया में कुछ भी तय नहीं है। और मैं भी नहीं।"

दिव्या की धड़कन तेज़ हो गई, उसका सीना डर और उम्मीद से कस गया। बाहर का खतरा अब उसके भीतर उठते तूफ़ान का प्रतिबिंब बन गया था—आकर्षण, ताकत, और अनिश्चितता का तूफ़ान। और पहली बार, उसने सोचा कि शायद इस दुनिया में ज़िंदा रहने का मतलब होगा—खुद को उस हद तक खो देना, जिसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी…

रात आगे बढ़ती रही, बक्सर की सड़कों पर फैली रोशनी भीगी हुई ज़मीन पर चमक रही थी, हर झलक एक याद दिला रही थी कि हर कदम का असर होता है। दिव्या ने महसूस किया कि वह अब सिर्फ़ एक गवाह नहीं रही, सिर्फ़ एक मोहरा नहीं रही। वह अब इस दुनिया का हिस्सा बन चुकी थी—इसके खतरे में उलझी हुई—और उस आदमी से अटूट रूप से जुड़ चुकी थी, जिसने उसकी ज़िंदगी… और उसका दिल… बिना इजाज़त के अपने नाम कर लिया था।

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