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Chapter 3

अमर साधना - Episode 3

अमर साधना

“नीली शक्ति का विस्फोट”

काली ऊर्जा का विशाल गोला बिजली की गति से आरव की ओर बढ़ रहा था।

तारा भय से चीख उठी—

“आरव!!”

पूरा जंगल काँपने लगा। पेड़ों की शाखाएँ टूटकर गिरने लगीं और हवा में अंधकार की गंध फैल गई।

आरव के पैर मानो जमीन से जकड़ गए थे।

वह पहली बार मृत्यु को इतने करीब महसूस कर रहा था।

लेकिन तभी…

उसके हाथ पर बना रहस्यमयी चिन्ह अचानक तेज़ी से चमकने लगा।

नीली रोशनी उसकी नसों में दौड़ गई।

“आह्ह्ह!”

आरव की आँखें चमक उठीं।

अगले ही क्षण उसके सामने नीली ऊर्जा की एक विशाल ढाल बन गई।

धड़ाआआम!!

काली ऊर्जा का गोला ढाल से टकराया और भयंकर विस्फोट हुआ।

पूरा जंगल प्रकाश और अंधकार की टक्कर से काँप उठा।

तारा जमीन पर गिर पड़ी।

जब धुआँ छँटा, तो आरव अभी भी खड़ा था।

उसके चारों ओर नीली ऊर्जा घूम रही थी।

“उसने… हमला रोक दिया?”

तारा अविश्वास से बोली।

महागुरु अमरेश की आँखों में आश्चर्य चमक उठा।

“असंभव… बिना प्रशिक्षण के इतनी शक्तिशाली रक्षा?”

लेकिन दानव क्रोध से गरज उठा।

उसकी काली त्वचा पर लाल चिन्ह चमकने लगे।

“गुर्रररर!!”

वह फिर से आरव की ओर झपटा।

इस बार उसकी गति इतनी तेज थी कि केवल काली परछाईं दिखाई दे रही थी।

आरव घबरा गया।

“मैं… मैं क्या करूँ?!”

गुरु अमरेश जोर से बोले—

“अपने मन को शांत करो! शक्ति भय से नहीं, आत्मा से नियंत्रित होती है!”

दानव अब बस कुछ कदम दूर था।

उसी क्षण आरव ने अपनी आँखें बंद कर लीं।

उसके भीतर अचानक एक अजीब शांति फैल गई।

फिर…

उसे एक धीमी आवाज़ सुनाई दी—

“अमर साधना के प्रथम द्वार को खोलो…”

आरव की चेतना मानो किसी दूसरी दुनिया में पहुँच गई।

उसने खुद को एक विशाल सुनहरे मंदिर के सामने खड़ा पाया। मंदिर के चारों ओर नीली अग्नि जल रही थी।

मंदिर के मध्य एक प्राचीन शिलालेख चमक रहा था—

“शक्ति उन्हीं को स्वीकार करती है, जिनका हृदय निर्भय हो।”

अचानक शिलालेख से प्रकाश निकला और आरव के शरीर में समा गया।

वास्तविक दुनिया में…

आरव की आँखें खुलीं।

अब उनकी चमक पूरी तरह बदल चुकी थी।

नीली ऊर्जा उसके शरीर के चारों ओर तूफान की तरह घूमने लगी।

दानव ने हमला किया—

लेकिन इस बार आरव पीछे नहीं हटा।

उसने अपना हाथ आगे बढ़ाया।

“रुको!”

क्षणभर में हवा जम गई।

दानव का शरीर बीच हवा में रुक गया।

“क्या?!”

तारा दंग रह गई।

आरव के हाथ से नीली ऊर्जा की लहर निकली।

धड़ाआआम!!

दानव कई पेड़ों को तोड़ता हुआ दूर जा गिरा।

पूरा जंगल शांत हो गया।

आरव खुद भी अपनी शक्ति देखकर स्तब्ध था।

लेकिन तभी…

दानव दर्द से चीखा और उसके शरीर से काला धुआँ निकलने लगा।

धीरे-धीरे वह धुआँ आसमान में इकट्ठा होकर एक विशाल चेहरे का रूप लेने लगा।

लाल चमकती आँखें…

भयानक मुस्कान…

उस रहस्यमयी चेहरे ने सीधे आरव की ओर देखा।

“तो… उत्तराधिकारी जाग चुका है…”

उसकी आवाज़ सुनते ही वातावरण ठंडा हो गया।

महागुरु अमरेश के चेहरे पर पहली बार भय दिखाई दिया।

“नहीं…

ये ‘कालनेत्र’ की शक्ति है…”

तारा काँप उठी।

“कालनेत्र?”

गुरु ने गंभीर स्वर में कहा—

“वह अंधकार का सम्राट है…

जिसने सदियों पहले पूरी साधना दुनिया को विनाश के किनारे पहुँचा दिया था।”

आसमान में बना काला चेहरा धीरे-धीरे मुस्कुराया।

“मैं जल्द ही लौटूँगा…

और इस बार कोई मुझे रोक नहीं पाएगा।”

अचानक पूरा जंगल जोर से काँपने लगा।

धरती के नीचे से किसी विशाल चीज़ के जागने की आवाज़ आने लगी…

क्रमशः…

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