अमर साधना - Episode 4
अमर साधना“धरती के नीचे जागा रहस्य”
धरती लगातार काँप रही थी।
पेड़ों की जड़ें मिट्टी से बाहर निकलने लगीं और जंगल के बीचों-बीच एक विशाल दरार बन गई।
तारा डरकर पीछे हट गई।
> “ये… ये क्या हो रहा है?”
महागुरु अमरेश का चेहरा गंभीर हो उठा।
उनकी आँखें उस दरार पर टिकी थीं, जहाँ से काली और नीली ऊर्जा एक साथ निकल रही थी।
> “नहीं… यह मुहर टूट रही है…”
आरव अभी भी अपनी नई शक्ति को समझने की कोशिश कर रहा था।
उसकी हथेली पर बना चिन्ह पहले से अधिक चमक रहा था।
अचानक—
धड़ाआआम!!
धरती फट गई।
उस दरार के भीतर से एक विशाल पत्थर का द्वार ऊपर उठने लगा।
द्वार पर प्राचीन अक्षर चमक रहे थे।
नीली अग्नि उसके चारों ओर घूम रही थी, जबकि बीच-बीच में काला धुआँ निकल रहा था।
तारा काँपते हुए बोली—
> “ये जगह… बहुत डरावनी है…”
महागुरु अमरेश धीरे-धीरे आगे बढ़े।
उन्होंने उन अक्षरों को ध्यान से देखा और अचानक उनके चेहरे का रंग उड़ गया।
> “असंभव…
यह ‘अमर गर्भ’ का द्वार है…”
आरव ने पूछा—
> “अमर गर्भ?”
गुरु ने गहरी साँस ली।
> “सदियों पहले महान साधकों ने कालनेत्र को रोकने के लिए उसकी शक्ति को इसी स्थान के नीचे बंद किया था।”
तारा की आँखें फैल गईं।
> “मतलब… कालनेत्र यहीं कैद था?”
गुरु ने सिर हिलाया।
> “हाँ… लेकिन अब मुहर कमजोर हो चुकी है।”
अचानक द्वार के भीतर से भारी कदमों की आवाज़ आने लगी।
ठक…
ठक…
ठक…
हर कदम के साथ धरती काँप रही थी।
आरव का दिल तेजी से धड़कने लगा।
फिर…
द्वार धीरे-धीरे खुला।
अंदर केवल अंधकार था।
लेकिन उस अंधकार में दो लाल आँखें चमकीं।
तारा भय से चिल्ला उठी—
> “कोई बाहर आ रहा है!”
अचानक एक विशाल काला हाथ द्वार से बाहर निकला।
उसके नाखून तलवार जैसे तेज थे।
फिर पूरा शरीर बाहर आया।
वह कोई दानव नहीं था…
बल्कि पत्थर और काली धातु से बना एक विशाल योद्धा था।
उसकी छाती के बीच लाल क्रिस्टल चमक रहा था।
> “अमर गर्भ का रक्षक…”
गुरु अमरेश बुदबुदाए।
विशाल योद्धा की आँखें अचानक जल उठीं।
उसकी नजर सीधे आरव पर पड़ी।
फिर उसकी भारी आवाज़ जंगल में गूँज उठी—
> “उत्तराधिकारी की पहचान सत्यापित की जा रही है…”
आरव चौंक गया।
> “उत्तराधिकारी?”
अचानक योद्धा की आँखों से लाल किरण निकली और सीधे आरव के चिन्ह पर पड़ी।
क्षणभर में आरव का शरीर नीली रोशनी से चमक उठा।
फिर…
उसके मन में अनगिनत दृश्य चमकने लगे।
युद्ध…
जलते हुए शहर…
आसमान में उड़ते साधक…
और एक विशाल काला सम्राट—
कालनेत्र।
आरव दर्द से चीख उठा।
> “आह्ह्ह!!”
तारा उसकी ओर दौड़ी—
> “आरव!”
लेकिन तभी…
विशाल योद्धा घुटनों के बल झुक गया।
पूरा जंगल स्तब्ध रह गया।
> “अमर साधना के स्वामी को प्रणाम…”
महागुरु अमरेश की आँखों में अविश्वास भर गया।
> “स्वामी…?
क्या आरव सच में उस प्राचीन शक्ति का उत्तराधिकारी है?”
लेकिन उसी क्षण…
आसमान अचानक काला हो गया।
बादलों के बीच लाल बिजली चमकी।
और एक भयानक आवाज़ गूँजी—
> “मैंने तुम्हें खोज लिया है… उत्तराधिकारी…”
आरव ने ऊपर देखा।
बादलों के बीच एक विशाल काली आँख खुल चुकी थी।
क्रमशः…