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Chapter 1

The Contract Marriage - Chapter 1

The Contract Marriage

सिटी एक्स अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर...

आदिति सिंह हवाई अड्डे से बाहर निकली और एक टैक्सी बुलाई। उसने ड्राइवर को पता बताया और कार में बैठ गई। जैसे ही टैक्सी चली, आदिति ने खिड़की से बाहर उस शहर को देखा, जो उसे इतना जाना-पहचाना लगता था...

वह छह साल बाद लौटी थी, लेकिन वो पुरानी यादें और अनुभव, जिन्हें वह भूलने की कोशिश कर रही थी, फिर से उसके दिमाग में आने लगे...

आदिति ने सिर हिलाकर उन विचारों को दूर भगाया।

इस बार वह पुरानी, बेकार यादों में खोने नहीं आई थी। वह इसलिए लौटी थी, क्योंकि उसके बॉस ने उसे वापस बुलाया था। बॉस ने बताया था कि उनकी कंपनी मुश्किल में है, और वह चाहता है कि आदिति आए और इस संकट को हल करे।

पहले तो आदिति नहीं आना चाहती थी, लेकिन सोचने के बाद उसने वापस आने का फैसला किया।

छह साल पहले, जब आदिति का बुरा वक्त था, तब उसके बॉस ने उसकी मदद की थी। अब वह उस एहसान को चुकाना चाहती थी...

बाकी सब चीजों की उसे अब कोई परवाह नहीं थी...

कंपनी में...जैसे ही आदिति वहां पहुंची, उसने देखा कि ज्यादातर कर्मचारी जोर-शोर से बातें कर रहे थे...

जैसे ही वह आगे बढ़ी, उनकी बातों के कुछ टुकड़े उसके कानों तक पहुंचे...

"सुना है, कई कंपनियां हमारी कंपनी खरीदना चाहती हैं..." "सच में! यानी हमें नया बॉस मिलेगा।"

"बस यही दुआ है कि नया बॉस अच्छा दिखे, किसी कोरियाई ड्रामा के सीईओ जैसा..."

"अरे! पता है, कंपनी कौन खरीद रहा है?"

आदिति ने उनकी बातें सुनी, पर गपशप पर ध्यान नहीं दिया। वह जानती थी कि इन लोगों को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि कंपनी कौन खरीदेगा या कितने में खरीदेगा...

वे तो बस गपशप करना चाहते थे।

लेकिन आदिति को फर्क पड़ता था... वह अपनी कंपनी के लिए अच्छा सौदा चाहती थी।

"बेशक, ये कश्यप, आर.के. ग्रुप होगा। इस शहर में और कौन इतना ताकतवर है जो उन्हें टक्कर दे सके?"

आदिति , जो आगे बढ़ने वाली थी, अचानक रुक गई...

एक नाम, जो उसे जाना-पहचाना और अनजान दोनों लगता था, उसके कानों में गूंजा...

"कश्यप्स...""आर.के. ग्रुप..."

अचानक, आदिति की दबी हुई यादें तूफान की तरह उमड़ पड़ीं। उसका दिमाग उन यादों से भर गया।

आदिति को चक्कर आने लगा।

उसे ऐसा लगा जैसे वह अभी भी उस आर.के. हवेली में फंसी है, ठंडी दीवारों के बीच...

आदिति को लगा था कि वह उसे बहुत पहले भूल चुकी थी, लेकिन अब उसे एहसास हुआ कि ये सिर्फ उसका भ्रम था...

फ्लैशबैक...

छह साल पहले...

आर.के. हवेली में…

आदिति गेट से अंदर आई और लिविंग रूम में पहुंची। लेकिन उसके चेहरे पर उदासी थी। वह ऐसे चल रही थी जैसे किसी सदमे में हो...

उसका चेहरा थोड़ा पीला लग रहा था।

"मैडम, क्या हुआ? तुम इतनी कमजोर और पीली क्यों दिख रही हो?"

बोलने वाली मिया थी। वह कश्यप में सालों से काम कर रही थी और आदिति को अपनी बेटी की तरह मानती थी। आदिति का पीला चेहरा देखकर मिया घबरा गई।

उसकी नजर आदिति के हाथ में पकड़ी रिपोर्ट पर पड़ी, और उसने पूछा,

"सब ठीक है?"

आदिति ने मुस्कुराकर जवाब दिया,

"कुछ नहीं, मैं ठीक हूँ।"

"लेकिन तुम्हारा चेहरा तो ठीक नहीं लग रहा। मैं तुम्हारे लिए कुछ बनाऊं? तुम्हारी पसंदीदा आलू पूरी..." मिया ने कहा।

"मिया... चिंता मत करो, मैं ठीक हूँ। बस..." आदिति ने अपने हाथ की रिपोर्ट पर नजर डाली और बोली, "मुझे दो महीने से पीरियड्स नहीं हुआ, और जब मैं अस्पताल गई..."

वह अपनी बात पूरी नहीं कर पाई और मिया की ओर उम्मीद और चिंता के साथ देखने लगी…वे दोनों बस एक-दूसरे को देखते रहे।

मिया समझ गई कि आदिति क्या कहना चाहती थी। वह गर्भवती थी। लेकिन मिया को मिस्टर आरके और आदिति का रिश्ता भी पता था। उसे समझ नहीं आया कि क्या कहे...

आखिर में, उसने सिर्फ बधाई दी...

आदिति चुप रही और अपनी रिपोर्ट को घूरती रही।

वह नहीं जानती थी कि क्या सोचे या क्या कहे...

उसकी शादी राघव कश्यप से तीन साल पहले हुई थी। लेकिन उनकी शादी प्यार से नहीं, बल्कि एक समझौते के तहत हुई थी, जिसकी मियाद तीन साल थी। क्योंकि राघव जिसे चाहता था, वह आदिति की बहन थी...

राघव को आदिति की बहन कृतिका से शादी करनी थी, लेकिन किसी वजह से आदिति ने उसकी जगह ले ली। शादी के दिन से ही राघव ने साफ कर दिया था कि उनकी शादी सिर्फ तीन साल का समझौता है, और इससे ज्यादा कुछ नहीं...

राघव के लिए यह शादी एक समझौता थी, लेकिन आदिति के लिए यह ईश्वर का तोहफा थी। क्योंकि सिर्फ वही जानती थी कि जब उसे पता चला कि वह राघव से शादी करेगी, तो वह कितनी खुश हुई थी...

वह उस शख्स से अपनी जवानी के दिनों से प्यार करती थी। इन सालों में, आदिति ने इस शादी में अपना सब कुछ लगा दिया था, इस उम्मीद में कि शायद उनकी शादी कामयाब हो जाए।

शायद राघव उसे तलाक न दे।

शायद वह उसके साथ रहना चाहे...

शायद इस बच्चे की वजह से वह उनके रिश्ते को एक मौका दे...

आदिति अभी भी अपने ख्यालों में खोई थी कि अचानक दरवाजे से एक आवाज आई, जिसने उसकी सारी उम्मीदें तोड़ दीं...

"मुझे ये बच्चा नहीं चाहिए..."

आवाज ठंडी और सख्त थी।

आदिति और मिया दोनों उस ओर देखने लगीं।

राघव दरवाजे पर खड़ा आदिति को घूर रहा था। उसका चेहरा ठंडा और भावहीन था। समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या सोच रहा है..

उसका चेहरा बहुत खूबसूरत था, और उसकी नीली आंखें गहरे समंदर जैसी थीं। अगर कोई उनमें देखे, तो डूब जाए।

राघव अंदर आया और आदिति के सामने खड़ा हो गया। वह किसी राजा की तरह लग रहा था, जो दुनिया से ऊपर हो और सबको छोटा समझे।

अपनी लंबी कद-काठी और प्रभावशाली रौब के साथ, उसमें गजब की ताकत झलक रही थी।

आदिति सोफे पर बैठ गई, उसकी मौजूदगी से दबकर।

वह बैठी रही, उसे घूरती रही, उसके शब्दों से स्तब्ध। उसने कभी नहीं सोचा था कि यह आदमी इतना बेरहम होगा, बिना सोचे ऐसे सख्त शब्द कह देगा।

जब उसने कहा कि उसे बच्चा नहीं चाहिए, उसकी आवाज में जरा भी हिचक नहीं थी।

आदिति ने उसकी आंखों में देखा, शांत रहने और अपने आंसुओं को रोकने की पूरी कोशिश की। वह इस ठंडे आदमी के सामने कमजोर नहीं दिखना चाहती थी

वे दोनों चुपचाप एक-दूसरे को देखते रहे।

थोड़ी देर बाद, राघव वहां आया और आदिति के सामने बैठ गया।

जैसे ही वह बैठा, उसके सहायक अलोक ने मेज पर कागजों का ढेर रख दिया। कागजों पर लिखा था, "अनुबंध समाप्त।"

अलोक ने आदिति की ओर देखा और बोला, "मिस आदिति , मिस्टर राघव के साथ आपके समझौते के मुताबिक, अब तीन साल पूरे हो गए हैं। प्लीज यहाँ सिग्नेचर करें और प्रक्रिया पूरी करें।"

आदिति ने गौर किया कि अलोक ने उसे मिसेज राघव की जगह मिस आदिति कहकर बुलाया। हालांकि उसने अभी सिग्नेचर नहीं किए थे। उसके चेहरे पर एक कड़वी मुस्कान आई।

उसे यकीन था कि अलोक इतनी हिम्मत नहीं करता, अगर किसी ने उसे ऐसा करने को न कहा होता। और वह कोई और नहीं, उसका पति था।

राघव ने पेन लिया और बिना कुछ सोचे सिग्नेचर कर दिए। फिर आदिति की ओर देखकर बोला,

"तुम यहाँ एक हफ्ते तक रह सकती हो और घर ढूंढ सकती हो।"

आदिति ने उसकी आंखों में देखा, जो झील की तरह शांत थीं...

उनमें कोई पछतावा, दुख या हिचक नहीं थी—कुछ भी नहीं।

ऐसा लग रहा था जैसे उसे उनके रिश्ते के बारे में कुछ महसूस ही नहीं हुआ, जो इतने बड़े बदलाव से गुजर रहा था...

लेकिन जैसे ही ये ख्याल उसके दिमाग में आया, उसने खुद को डांटा।

"आदिति , क्या तुम बेवकूफ हो?"

"इस पत्थर दिल इंसान से तुम पछतावे या दुख की उम्मीद कैसे कर सकती हो?"

लेकिन फिर भी, वह अपनी भावनाओं को काबू नहीं कर पाई...

क्योंकि वह इतने सालों से इस ठंडे आदमी से प्यार करती थी।

आदिति चुप रही और उस आदमी को देखती रही, जिसके साथ उसने पिछले तीन साल बिताए थे। वह रोज उसका चेहरा देखती थी, फिर भी अब वह उसे बहुत खूबसूरत लग रहा था..

लेकिन... यही वह आदमी था, जिसने उसका दिल हजार टुकड़ों में तोड़ दिया था।

वह उसके सामने अपनी कमजोरी नहीं दिखाना चाहती थी, इसलिए उसने रोने से बचने की पूरी कोशिश की। पेन पकड़ते वक्त उसका हाथ कांप रहा था

उसने कागजों को देखा, राघव की सुंदर और साफ लिखावट देखी और अपना नाम लिख दिया।

उसकी लिखावट भी उसके दिल की तरह टूटी हुई थी।

आदिति अंदर से टूट चुकी थी, पर उसने अपने चेहरे पर ये जाहिर नहीं होने दिया। सिग्नेचर करने के बाद, उसने गहरी सांस ली और बोली...

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