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Chapter 5

The Replaced bride - Chapter 5

The Replaced bride

मिस्टर सिसोदिया ने तारा के रुकने का इंतज़ाम भी करवा दिया था। पैलेस घूमने के बाद उसने जीवन के साथ डिनर किया, और उसके बाद सोने जा चुकी थी।

अगली सुबह ध्रुव, ग्रीष्मा के साथ मिस्टर सिसोदिया से मिलने गया। जीवन भी वहीं उनके साथ मौजूद था।

“उम्मीद है सर, आपको और आपकी मंगेतर को यहाँ सब कुछ पसंद आ गया होगा।” मिस्टर सिसोदिया ने फ़ॉर्मली कहा।

“रात को देर हो जाने की वजह से बात करने का मौक़ा ही नहीं मिला। आपने हॉल को काफ़ी अच्छे से डेकोरेट करवाया था, जबकि इसकी कोई ज़रूरत नहीं थी।” ध्रुव ने कहा।

उसकी बात को आगे बढ़ाते हुए ग्रीष्मा भी बोली, “और अगर खाने की बात करूँ, तो वह सच में लाजवाब था।”

“जी, आप तो जानते हैं कि हम लोग अपनी परम्पराओं को कितना महत्त्व देते हैं। बस उसी के हिसाब से मैंने तैयारियाँ करवाई थीं। बाक़ी अगर लोगों को नहीं पसंद आता है, तो उनकी खुशी के लिए बदलाव भी करवा देते हैं।” मिस्टर सिसोदिया ने बताया। ध्रुव की तरफ़ से पॉज़िटिव रिस्पांस देखकर वह बहुत खुश थे।

“वैसे तो ध्रुव ने शादी के लिए वेडिंग प्लानर हायर कर लिया है, लेकिन रात की अरेंजमेंट्स देखकर मैं सच में बहुत इम्प्रेस हूँ। मैं चाहती हूँ कि शादी के मेन फ़ंक्शन्स का काम आप ही संभालें।” ग्रीष्मा ने खुश होकर कहा।

मिस्टर सिसोदिया को अभी तक इस बात का पता नहीं था कि तारा और जीवन ने वहाँ सब कुछ बदल दिया था। जीवन सब कुछ समझ गया था। वहाँ तारीफ़ मिस्टर सिसोदिया द्वारा की गई अरेंजमेंट्स की नहीं, बल्कि तारा की मेहनत की हो रही थी।

“जी शुक्रिया.....” जीवन ने बीच में बोलते हुए कहा, “लेकिन आप जिन अरेंजमेंट्स की बात कर रहे हैं, वह हमने नहीं करवाई थीं।”

उसकी बात सुनकर मिस्टर सिसोदिया के साथ-साथ ध्रुव और ग्रीष्मा भी चौंक गए। तभी तारा भी वहाँ पर आ गई।

जीवन ने तारा की तरफ़ इशारा करके कहा, “हमारी अरेंजमेंट्स काफ़ी सिम्पल थीं, जबकि तारा जी चाहती थीं कि आपका डिनर थोड़ा स्पेशल हो, इसलिए उन्होंने खुद वह सब तैयारियाँ की थीं।” जीवन ने बताया।

“आपको पसंद आया?” तारा ने खुश होकर पूछा।

“हाँ, तारा, सब कुछ बहुत ब्यूटीफ़ुल था। अब मुझे समझ में आया कि ध्रुव की चॉइस बिल्कुल परफ़ेक्ट थी। तुमने सब कुछ बहुत अच्छे से किया।” ग्रीष्मा ने जवाब में कहा।

“हाँ, कल रात मेरी वजह से आपका सरप्राइज़ ख़राब हो गया। मैंने देखा कैसे इनकी शक्ल पर बारह बज रहे थे। जानती हूँ, मेरी गलती है, लेकिन मैंने जानबूझकर नहीं किया था। मेरी वजह से आप दोनों का मूड ख़राब हुआ, इसलिए मैंने सोचा कि क्यों ना मैं ही कुछ ऐसा करूँ, जिसकी वजह से आप दोनों का मूड अच्छा हो जाए।” तारा ने जल्दी-जल्दी बोलते हुए कहा।

उसकी तरफ़ देखते हुए मिस्टर सिसोदिया के चेहरे पर हल्की स्माइल आ गई। “एक शुक्रिया हम भी आपको कहना चाहेंगे। आप हमारे पैलेस के लिए काम नहीं करतीं, उसके बावजूद आपने यहाँ के काम को बेहतर बनाने का सोचा।” मिस्टर सिसोदिया ने तारा से कहा।

“कोशिश काफ़ी अच्छी थी, मिस तारा, लेकिन अब कुछ नहीं हो सकता। कल रात को मेरी शक्ल पर बारह बज रहे थे, लेकिन लगता है अब वही बारह आपकी शक्ल पर बजने वाले हैं।” ध्रुव ने सख़्त आवाज़ में कहा। उसे तारा का इतना फ़्रेंडली होना अच्छा नहीं लग रहा था।

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तारा उसकी बात का मतलब नहीं समझ पाई। वह कुछ पूछ पाती, उससे पहले उसके पास वेडिंग प्लानर का कॉल आया।

“तारा..... तुम्हारा कुछ नहीं हो सकता। तुम जहाँ भी जाती हो, बस गड़बड़ ही करती हो। मैंने तुम्हें जाने से पहले भी वार्निंग दी थी कि यह तुम्हारा लास्ट चांस है। अगर यहाँ से भी तुम्हारी शिकायत आई, तो मैं तुम्हें काम से निकाल दूँगी।” सामने से तारा की बॉस, मिस गुप्ता बोल रही थी।

उसकी बात सुनकर तारा का मुँह उतर गया। उसने ध्रुव की तरफ़ घूरकर देखा।

“लगता है बारह बज गए हैं।” ध्रुव ने तारा की तरफ़ देखकर भौंहें उठाकर कहा।

“यह तुमने क्या किया, ध्रुव..... मैंने तुम्हें मना किया था ना.....” ग्रीष्मा ने सिर हिलाकर कहा।

मिस्टर राम सिंह सिसोदिया और जीवन एक-दूसरे की तरफ़ देख रहे थे। उन्हें ध्रुव से इस तरह के बर्ताव की उम्मीद नहीं थी।

तारा के हाथ से इतना बड़ा काम चला गया था, तो दुख से उसकी आँखें नम होने लगी थीं। उसने धीरे से कहा, “ठीक है मैम, मैं आ जाऊँगी।”

“तुम आओ या ना आओ, मुझे इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। अब तुम मेरी एजेंसी में काम नहीं कर सकती। आकर अपनी सैलरी ले जाना।” इतना कहकर मिस गुप्ता ने कॉल कट कर दिया था।

तारा ने गुस्से में ध्रुव की तरफ़ देखा। उसके चेहरे पर मुस्कान थी। उन सब लोगों को तारा की शक्ल देखकर लगा कि वह अभी गुस्से में सब पर चिल्ला देगी, लेकिन उसने कुछ नहीं कहा और ऊपर अपना बैग लाने चली गई।

“ध्रुव, दिस वाज़ टोटली अनएक्सपेक्टेड, स्पेशली फ़्रॉम यू.....” ग्रीष्मा ने अपनी नाराज़गी जताई।

“बाद में बात करते हैं, मिस्टर सिंघानिया..... जीवन, तुम मेरे साथ आओ।” मिस्टर राम सिंह सिसोदिया ने उन दोनों के बीच में बोलना ज़रूरी नहीं समझा। वह जीवन को लेकर वहाँ से चले गए।

“मिस्टर सिंघानिया से मुझे यह उम्मीद बिल्कुल नहीं थी। माना कि छोरी से गलती हो गई होगी, लेकिन काम से निकलवाना? किसी की रोज़ी-रोटी छीनना भला काम ना होवे है।” वहाँ से हटने के बाद मिस्टर सिसोदिया ने कहा। वह उससे टिपिकल राजस्थानी भाषा में बात कर रहे थे।

“बुरा तो मुझे भी बहुत लग रहा है सर..... मुझे नहीं पता इन दोनों के बीच क्या हुआ होगा, लेकिन रात को तारा बिना अपना फ़ायदा-नुक़सान सोचे मिस्टर सिंघानिया का मूड सही करने के लिए इतनी मेहनत कर रही थी। वह हमारे पैलेस की मेहमान थी। चाहती तो यहाँ काम करने वाले लोगों को भी सब कुछ समझा सकती थी। पर उसने सब कुछ अपने हाथों से किया। इससे साफ़ पता चलता है कि लड़की कितनी मेहनती है।” जीवन ने रात की सारी बात मिस्टर सिसोदिया के सामने रख दी। रात को उसे उनसे बात करने का मौक़ा नहीं मिला। कुछ ही समय में उसने तारा को अच्छे से समझ लिया था।

“मैं देखता हूँ, कुछ किया जा सके तो.....” बोलते हुए अचानक मिस्टर सिसोदिया रुक गए। उन्होंने देखा, तारा अपने सामान के साथ वहाँ से गुज़र रही थी।

उसकी आँखों में आँसू थे। जाते वक़्त वह जीवन और मिस्टर सिसोदिया के पास आई।

“आपका राज-महल देखने में वाक़ई बहुत सुन्दर है। आज से पहले मैंने इतनी ख़ूबसूरत जगह नहीं देखी। आपने जो ख़ातिरदारी की, उसके लिए आपका धन्यवाद। चलती हूँ..... नमस्ते।” तारा ने अपने दोनों हाथ जोड़कर भारी आवाज़ में कहा और अपना सामान लेकर वहाँ से जाने लगी।

“सुनो.....” मिस्टर सिसोदिया ने उसे पीछे से आवाज़ लगाई। “अगर तुम्हारे घर वाले तुम्हें यहाँ रुकने की इजाज़त दें, तो तुम यहाँ काम कर सकती हो।”

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उनकी बात सुनकर तारा उनकी तरफ़ मुड़ी। उसने मुस्कुराकर कहा, “आपके मान-सम्मान के लिए शुक्रिया..... लेकिन मैं अपने लायक काम ढूँढ दूँगी।”

अपनी बात कहकर तारा वहाँ से चली गई। उसके जाने के बाद मिस्टर सिसोदिया ने कहा, “घणी खुद्दार लड़की है। खूब आगे तक जाएगी।”

“मैं उसे बाय बोलकर आता हूँ।” जीवन ने कहा और तारा के पीछे जाने लगा।

बाहर ग्रीष्मा और ध्रुव खड़े थे। ध्रुव के चेहरे पर कोई भाव नहीं थे, जबकि ग्रीष्मा के चेहरे पर साफ़ नज़र आ रहा था कि वह ध्रुव की इस हरकत पर खुश नहीं हैं।

ग्रीष्मा तारा के पास आकर दबी आवाज़ में बोली, “डोंट वरी, मैं ध्रुव को मना लूँगी। तुम वापस गुजरात मत जाना।”

“अब उसका कोई फ़ायदा नहीं है, मैम। उन्होंने मुझे नौकरी से निकाल दिया है।” तारा ने जवाब में कहा।

“उन्होंने निकाल दिया है, तो क्या हुआ? तुम्हारी अरेंजमेंट्स बहुत अच्छी थीं। मुझे तुम भी अच्छी लगी। तुम एक काम करो, जोधपुर घूमो, यहाँ की राज कचोरी और दाल-बाटी-चूरमा खाओ। मैं तुम्हें शाम को यहीं पैलेस में मिलती हूँ।” ग्रीष्मा ने आई-विंक करके कहा।

“लेकिन ध्रुव सर तो.....” तारा हैरानी से बोली।

ग्रीष्मा ने उसकी बात बीच में काटकर कहा, “मैं अच्छे से जानती हूँ, ध्रुव को कैसे मनाना है। अभी के लिए यहाँ से जाओ।”

तारा को ग्रीष्मा की बात समझ नहीं आ रही थी। फिर भी उसने हामी भरी और वहाँ से चली गई।

“अगर तुम्हारा इस लड़की से बात करना हो गया हो, तो यहाँ से वापस चलें?” ध्रुव ने पूछा।

“नहीं, ध्रुव..... मैं आज पहली बार जोधपुर आई हूँ, और तुम मुझे सीधे ही यहाँ से लेकर जा रहे हो। मैं कुछ नहीं जानती, मुझे पूरा जोधपुर घूमना है।” ग्रीष्मा ने जवाब दिया।

“थोड़ी देर पहले तो तुम मुझसे नाराज़ थी। मुझे लगा था कि तुम उस लड़की के लिए मुझसे झगड़ा करोगी।” ध्रुव ने चौंकते हुए पूछा।

“ऐसा कुछ नहीं है..... और उसके बाद में हम बाद में आराम से बात करेंगे।” ग्रीष्मा ने बात को टाल दिया।

ध्रुव को उसका बदला हुआ बर्ताव समझ नहीं आ रहा था। उसने ज़्यादा कुछ नहीं पूछा और उसके बाद पर सहमति जताते हुए उसे घुमाने के लिए ले जाने लगा।

जबकि ग्रीष्मा मन ही मन तारा को वापस लाने के बारे में प्लान बना रही थी।

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