The Replaced bride - Chapter 8
The Replaced brideतारा, ग्रीष्मा और ध्रुव के साथ जयपुर आ चुकी थी। अगले दिन, सब उठकर अपने-अपने दिनचर्या में लग गए थे, जबकि तारा देर तक सो रही थी।
ध्रुव के छोटे भाई-बहन, डब्बू और चिंटू, तारा से मिलने के लिए गेस्ट रूम में आए।
तारा के मोबाइल में ग्रीष्मा का कॉल आ रहा था; उसके बावजूद वह आराम से सो रही थी।
डब्बू ने तारा का मोबाइल उठाया और कॉल साइलेंट करके कहा, “लगता है यह हमारी टाइप की है। इनसे अच्छी जमेगी।”
“सही कहा, डब्बू… चलो, कोई तो हमारे जैसा मिला। इसका प्लस पॉइंट यह है कि इसे ध्रुव भैया बिल्कुल पसंद नहीं करते।” चिंटू ने सीरियस टोन में कहा।
“लेकिन माइनस पॉइंट यह है कि यह ग्रीष्मा को पसंद है। फिर भी, यहाँ तक आ ही गए हैं, इनसे दोस्ती भी कर लेते हैं। क्या पता यह हमारे काम आए… रुको, मैं इसे उठाती हूँ।” डब्बू ने कहा और इधर-उधर देखा। बेड साइड पर पानी का गिलास रखा हुआ था। उसने पूरा का पूरा गिलास तारा के मुँह पर उड़ेल दिया।
पानी गिरने पर तारा हड़बड़ाकर उठी। उसने सामने डब्बू और चिंटू को देखा, जो उसकी तरफ़ मुस्कुराकर देख रहे थे।
“इस घर के लोगों की प्रॉब्लम क्या है? ठीक से जगाना नहीं आता क्या? ऐसे सोते हुए इंसान के ऊपर कौन पानी डालता है?” तारा ने मुँह बनाकर कहा।
“अरे, आप तो नाराज़ हो गईं।” डब्बू ने उसके पास बैठकर कहा।
“अब तुम दोनों ने हरकत ही ऐसी की है। चलो, बताओ तुम दोनों कौन हैं?” तारा ने पूछा।
चिंटू ने उन दोनों का परिचय देते हुए कहा, “मैं साहित्य और यह मेरी बहन, साक्षी…”
“और मैं तारा…” उनके बाद तारा ने अपना नाम बताया।
“वैसे, सब हमें प्यार से डब्बू और चिंटू बुलाते हैं। हम ध्रुव भैया के छोटे भाई-बहन हैं।” डब्बू ने बताया।
तारा ने उन दोनों की तरफ़ घूरकर देखा और फिर कहा, “तुम दोनों को मेरी जासूसी करने के लिए यहाँ तुम्हारे भैया ने भेजा है ना?”
“अरे, नहीं-नहीं, आप हमें गलत समझ रही हैं। हम तो आपसे दोस्ती करने आए हैं।” डब्बू ने कहा।
“मुझसे दोस्ती? और वह क्यों?” तारा ने हैरानी से पूछा।
चिंटू भी डब्बू के पास बैठ गया और धीमी आवाज़ में कहा, “दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है। हमने सुना आपकी और ध्रुव भैया के बीच ज़्यादा बनती नहीं, तो सोचा आपसे दोस्ती कर लें। हमारी भी आजकल उनसे कुछ ख़ास नहीं बन रही।”
डब्बू ने उसकी हाँ में हाँ मिलाई। तारा ने उन दोनों को मुस्कुराते हुए थम्सअप किया। “हाँ, फिर तुम दोनों मेरी टीम में शामिल हो सकते हो।”
“येप्स…” डब्बू ने कहा, और तीनों ने एक साथ हाई-फाई की।
“वैसे, मैं तुम लोगों को तुम्हारे रियल नाम से ही बुलाऊँगी। डब्बू और चिंटू… यह कुछ बच्चों जैसे नाम लगते हैं, और तुम दोनों की बातें देखकर लगता है कि अब तुम दोनों बच्चे नहीं रहे।” तारा ने ड्रामेटिक तरीके से कहा।
“चलो, किसी को तो समझ आया कि अब हम बच्चे नहीं रहे। वरना घरवाले तो हमें हर काम से दूर रखते हैं। उनके हिसाब से तो हम अभी तक किंडरगार्टन में पढ़ते हैं।” साक्षी (डब्बू) ने मुँह बनाकर कहा।
“हम दोनों इतने बड़े हो गए, उसके बावजूद हमें कार ड्राइव करने को नहीं देते। हमारे साथ ड्राइवर को भेजते हैं। शॉपिंग करने जाते हैं, तो क्रेडिट कार्ड नहीं मिलता।” साहित्य (चिंटू) ने उसकी बात को आगे बढ़ाया।
तारा ने उनकी बात पर सहमति जताई और फिर चेहरे के भाव को गंभीर करते हुए कहा, “फिर तो तुम दोनों के साथ बहुत नाइंसाफी हो रही है। और मैं अच्छे से जानती हूँ, इन सब के पीछे उस ध्रुव सिंघानिया का ही हाथ होगा।”
“हाथ… नहीं, तारा दीदी, उनका हाथ, पैर, दिमाग सब इस काम में लगा हुआ है।” साक्षी ने कहा।
“डोंट वरी, साक्षी, अब मैं यहाँ आ गई हूँ। ज़्यादा कुछ नहीं कर पाई, तो तुम दोनों को तो इंसाफ़ दिला ही दूँगी।” तारा ने उसकी पीठ सहलाकर कहा।
साक्षी और साहित्य तारा से मिलकर बहुत खुश थे। कुछ ही देर की बातों में उन दोनों की उसके साथ अच्छी जमने लगी। तीनों साथ में बैठकर ध्रुव की बुराइयाँ करने में लगे थे।
“सच कहूँ, तो मुझे तुम्हारा वह भाई बहुत अजीब लगा। इतना एटीट्यूड… और बेवजह दूसरों पर चिल्लाना। मेरी इतनी सी… इतनी सी मतलब नाखून से भी छोटी गलती थी, फिर भी मुझे काम से निकलवा दिया। शुतुरमुर्ग कहीं का…” तारा मुँह बनाकर बोली।
जैसे ही तारा ने ध्रुव को शुतुरमुर्ग कहा, साक्षी और साहित्य जोर से हँस पड़े।
“बिल्कुल सही नाम दिया है।” साक्षी ने कहा।
“हमें लगा था, हमारी भाभी अच्छी आएगी, तो हमें थोड़ी फ़्रीडम मिलेगी, लेकिन नहीं… वह ग्रीष्मा… शी इज़ वेरी सेल्फ़िश… वह तो हमसे ठीक से बात तक नहीं करती।” साहित्य ने बताया।
“मुझे तो ग्रीष्मा मैम बहुत अच्छी लगी, लेकिन संगत का थोड़ा बहुत असर तो आ ही जाता है। वैसे, तुम लोगों को बता दूँ, उन्होंने ही तो मुझे जॉब पर रखा है, वरना तुम्हारे उस खड़ूस भाई का बस चलता, तो आज मैं जयपुर में नहीं, बल्कि वापस अहमदाबाद में होती।” तारा बोली।
तारा की बात सुनकर साक्षी और साहित्य एक-दूसरे की तरफ़ हैरानी से देखने लगे।
“मुझे यकीन नहीं हो रहा कि आप सच कह रही हैं। उस लड़की को आए हुए दो महीने हो गए, लेकिन उसने ऐसा कोई काम नहीं किया, जिसके लिए भाई मना कर दे… भाई के काम से निकालने के बाद वह आपको यहाँ पर लेकर आई है, इसका मतलब ज़रूर उसका कोई मक़सद होगा।” साक्षी ने कहा।
“हाँ, कोई बड़ा मक़सद…” साहित्य ने उसकी हाँ में हाँ मिलाई।
इन दोनों की बातें सुनकर तारा हँस पड़ी। “मक़सद? उन्होंने मुझे अपने असिस्टेंट के तौर पर हायर किया है।”
“हाँ, तो यह भी एक तरह का मक़सद ही हुआ ना… ख़ैर, छोड़िए, हमें उसके बारे में बात नहीं करनी। अब आप हमारे साथ बाहर चलिए।” साक्षी ने कहा।
“हाँ, तारा दीदी, साक्षी सही कह रही है। आप इतनी अच्छी हैं, उसके बावजूद ध्रुव भैया घरवालों के सामने आकर गलत इमेज बनाने में लगे हैं।” साहित्य ने कहा।
“उसकी इतनी मजाल…” तारा जल्दी से बिस्तर से खड़ी हुई और बाहर जाने लगी।
उसके उठते ही साहित्य और साक्षी दौड़कर दरवाज़े के आगे खड़े हो गए।
“क्या? अभी थोड़ी देर पहले तो तुम दोनों कह रहे थे कि तुम्हारा भाई मेरी नेगेटिव इमेज बना रहा है, और अब मुझे बाहर जाने से रोक रहे हो?” तारा ने हैरानी से पूछा।
“वह इसलिए, क्योंकि अगर आप बिना नहाए बाहर गईं, तो भाई अपने काम में सक्सेसफ़ुल हो जाएँगे। आप नहाकर बाहर जाना।” साक्षी ने कहा।
तारा ने उनकी बात पर हामी भरी और जल्दी से अपने लिए ड्रेस निकाली। उसके बाद वह नहाने जा चुकी थी, जबकि साक्षी और साहित्य बाहर बैठकर उसका इंतज़ार कर रहे थे।
कुछ देर बाद तारा तैयार हो गई, तो वे दोनों उसे बाहर लेकर गए।
ध्रुव, ग्रीष्मा के पापा, भावेश जी के साथ वहाँ से जा चुका था। बाकी की फैमिली बाहर ही मौजूद थी।
ध्रुव की दादी, गायत्री जी की नज़र तारा पर पड़ी। उन्होंने अपना चश्मा सही किया और उसे घूरकर देखा। “ओह तो, यह है वह छोरी, जिसके बारे में ध्रुव बात कर रहा था।”
उनकी बात सुनकर रत्ना और सरिता जी ने तारा की तरफ़ देखा। तारा जल्दी से उनके पास गई और उन सब के पैर छूने लगी।
“अच्छा-अच्छा, खुश रहो। हमारे यहाँ छोरियाँ पैर नहीं छूती हैं।” रत्ना ने आशीर्वाद देकर कहा।
“लड़की तो ठीक-ठाक ही लग रही है, फिर ध्रुव इसकी बुराई क्यों कर रहा था? नाम क्या है, थारा?” ध्रुव की दादी ने पूछा।
“जी, तारा…” तारा ने बिल्कुल धीमी आवाज़ में जवाब दिया।
“कल से टाइम पर उठ जाना। चलो, अब कुछ खा लो। ग्रीष्मा कब से तुम्हारी राह देख रही है। वह ऊपर अपने कमरे में है।” ग्रीष्मा की माँ, सरिता जी ने कहा।
तारा ने बिना कुछ बोले, हाँ में सिर हिलाकर उनकी बात पर सहमति जताई। उसके बाद वे नाश्ता करने बैठ गए। साक्षी और साहित्य भी उसी के पास में थे।
“मान गए, तारा दीदी… हमने जैसे आपको बताया था, आपने बिल्कुल वैसे ही एक्ट किया।” साहित्य ने बिल्कुल धीमी आवाज़ में कहा।
“बस तुम दोनों मेरी ऐसे ही हेल्प करते रहना। हम तीनों मिलकर ध्रुव सिंघानिया से निपट लेंगे। बहुत हो गए उसके अत्याचार, अब हम उसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाएँगे।” तारा ने खाते हुए कहा।
“हाँ, लेकिन ग्रीष्मा से भी बचकर रहना। जितनी सीधी वह बनती है, उतनी है नहीं…!” साक्षी ने कहा।
तारा ने उसकी बात पर हामी भरी। नाश्ता करने के बाद वह ऊपर ग्रीष्मा के कमरे में गई।
“यहाँ सब कुछ अच्छे से हो रहा है। मैंने तारा को अपना असिस्टेंट हायर कर लिया है, हालाँकि ध्रुव को वह लड़की बिल्कुल पसंद नहीं है, लेकिन मुझे…” ग्रीष्मा किसी से फ़ोन पर बात कर रही थी। जैसे ही उसने तारा को देखा, उसने जल्दी से अपना फ़ोन बंद कर दिया।
“क्या हुआ? आप तो मुझे देखकर ऐसे घबरा रही हैं, जैसे आपने कोई भूत देख लिया हो।” तारा ने अंदर आते हुए कहा।
“नहीं… मुझे लगा ध्रुव की फैमिली में से कोई है। उन्हें अभी तक इस बात का पता नहीं है कि मैंने ध्रुव के मना करने के बाद तुम्हें जॉब पर रखा है। मैं अपनी फ़्रेंड से बात करके उसे सब कुछ बता रही थी। प्लीज़, तुम भी उन्हें इस बारे में कुछ मत बताना।” ग्रीष्मा ने सफ़ाई दी।
तारा ने उसकी बात पर हामी भरी। “आप मुझे बता दीजिए कि क्या काम करना है?” तारा ने पूछा।
“हाँ… हम दोनों यहाँ से बुटीक जाएँगे। वहाँ तुम मेरी ड्रेस और मेकअप, ज्वेलरी, इन सब में हेल्प करना। मुझे हर एक फ़ंक्शन के लिए ड्रेस फ़ाइनल करनी है।” ग्रीष्मा ने बताया।
“ठीक है… लेकिन आप जानती हैं ना, आजकल ड्रेसेस थीम के अकॉर्डिंग होती हैं। ब्राइड और ग्रूम दोनों कलर मैच करके ड्रेस सेलेक्ट करते हैं।” तारा ने कहा।
“हाँ, तो क्या हुआ? ध्रुव भी तो हमारे साथ चल रहा है।” ग्रीष्मा ने बताया।
“फिर मेरी क्या ज़रूरत है?” तारा ने झट से कहा।
“क्योंकि तुम मेरी असिस्टेंट हो। अब सारी चीज़ें मैं अकेले ही हैंडल कर सकती, तो तुम्हें क्यों हायर करती? कोशिश करना कि ध्रुव और तुम्हारे बीच में दोस्ती हो सके। ध्रुव अभी कुछ देर में आता ही होगा। मैं चेंज करके आती हूँ।” ग्रीष्मा ने कहा और चेंज करने के लिए बाथरूम में चली गई।
“दोस्ती और उस अकड़ू से… कभी भी नहीं। दोस्त तो छोड़ो, इस बंदर को तो मैं अपना दुश्मन भी ना बनाऊँ।” तारा ने मुँह बनाकर कहा। उसने खिड़की से नीचे देखा, तो ध्रुव की गाड़ी आ चुकी थी।
“आ गया चमगादड़… अब एक और पूरा दिन इसे झेलो…” तारा ने मुँह बनाया और वहाँ पर बैठकर ग्रीष्मा के आने का इंतज़ार करने लगी।
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