The Replaced bride - Chapter 11
The Replaced brideध्रुव, ग्रीष्मा, और तारा शॉपिंग के लिए गए थे। वहाँ, लिफ्ट में, उन तीनों पर एक गुंडे ने हमला कर दिया। वह ध्रुव का पुराना दुश्मन था।
उस आदमी ने चाकू ग्रीष्मा की गर्दन पर रख दिया था। चाकू से ग्रीष्मा को चोट लगी और वहाँ से खून निकलने लगा। ग्रीष्मा दर्द से चिल्ला रही थी; उसकी आँखों में आँसू थे।
उसे तकलीफ में देखकर, ध्रुव उस आदमी पर गुस्से में जोर से चिल्लाया। “तुम जो भी हो, मैं तुम्हें नहीं जानता। तुमने जो भी किया है, उसकी तुम्हें बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी। अब तक तो मैंने तुम्हारे साथ कुछ नहीं किया होगा, लेकिन इन सब के बाद तुम्हारे साथ जो भी होगा, उसके जिम्मेदार तुम खुद होंगे।”
ध्रुव गुस्से में उसकी ओर बढ़ रहा था। उस आदमी ने जवाब में ग्रीष्मा पर अपनी पकड़ और भी कस ली।
“अगर तुमने एक भी कदम आगे बढ़ाया, तो इस लड़की की लाश मैं यहीं गिरा दूँगा।”
उस आदमी की धमकी से ध्रुव के कदम वहीं रुक गए। वह ग्रीष्मा की ओर लाचारी से देख रहा था। ध्रुव के चेहरे पर लाचारी के भाव देखकर, उस आदमी के होठों पर मुस्कराहट फैल गई।
“घबराओ मत, ध्रुव सिंघानिया। मैं इस बंद लिफ्ट में तुम तीनों के साथ कुछ नहीं करूँगा। मैंने सुना है कि जोधपुर के उम्मेद भवन पैलेस में दस दिन बाद तुम्हारी शादी है। तुम्हारी शादी के दिन ही, आज से ठीक दस दिन बाद, इस लड़की और तुम्हारे पूरे परिवार के साथ जो भी होगा, वह तुम अपनी आँखों से देखोगे… और तब भी तुम इसी तरह लाचार खड़े रहोगे। तुम चाहकर भी कुछ नहीं कर पाओगे, ध्रुव सिंघानिया।” वह आदमी पूरी सख्ती से बोला।
“देखो, मैं तुम्हें नहीं जानता। जब तक तुम मुझे नहीं बताओगे, मुझे कैसे पता चलेगा कि आखिर मैंने क्या किया है?” ध्रुव ने बेबसी से पूछा।
“बताऊँगा, ज़रूर बताऊँगा, लेकिन उस दिन… जिस दिन तुम्हारी शादी होगी, आज से ठीक दस दिन बाद… जब तुम्हारी आँखों के सामने इन सब की लाशें गिरी होंगी, तब मैं तुम्हारे किए के गुनाह तुम्हारे सामने रखूँगा। आज तुम्हारी आँखों में जो लाचारी है, वह देखकर बहुत सुकून मिल रहा है। इन दस दिनों में याद करने की कोशिश करो कि तुमने अपनी ज़िन्दगी में कौन-कौन से पाप किए हैं।”
अचानक लिफ्ट रुकी और वे लोग ग्राउंड फ्लोर पर पहुँच चुके थे। दरवाज़ा खुलते ही उस आदमी ने ग्रीष्मा को ध्रुव की ओर धक्का दिया और वहाँ से भाग गया। ध्रुव ग्रीष्मा को संभालने में लगा था, जबकि तारा जल्दी से दौड़कर उसके पीछे गई।
“तारा, रुको…” ध्रुव ने पीछे से चिल्लाकर कहा, लेकिन तारा ने उसकी बात अनसुनी कर दी और वह उस आदमी के पीछे जाने लगी।
“ध्रुव, प्लीज़, तुम अभी के लिए उसे छोड़ दो। मुझे बहुत दर्द हो रहा है। प्लीज़, मुझे हॉस्पिटल ले चलो।” ग्रीष्मा ने रोते हुए कहा। उसके गर्दन पर लगे घाव से खून बह रहा था।
“लेकिन तारा… ग्रीष्मा हमारे शहर में नई है और हमारे घर का रास्ता भी ठीक से नहीं जानती होगी।”
“ध्रुव, उसे लेने के लिए हम ड्राइवर को भेज देंगे… मुझे बहुत दर्द हो रहा है, प्लीज़…”
ध्रुव ने उसकी बात मान ली और उसे उठाकर गाड़ी में ले गया। ग्रीष्मा के चोट लगने की वजह से ध्रुव को तारा को वहीं छोड़कर जाना पड़ा।
वह आदमी वहाँ से भागते हुए जा रहा था। तारा उसके पीछे-पीछे दौड़ रही थी।
“मैं भी देखती हूँ तुम भागकर कहाँ जाओगे। तुम जानते नहीं हो, अभी मुझे… तुम्हें तो मैं पकड़कर ही दम लूँगी।” तारा पीछे से चिल्लाकर बोली।
अगले ही पल एक गाड़ी सामने आई और वह आदमी भागकर उसमें बैठ गया। उसने गाड़ी में बैठने के बाद गाड़ी का शीशा नीचे किया और मुस्कुराते हुए तारा की ओर हाथ हिलाया।
“भाग गया…” तारा अपने पैर पटककर बोली। “अरे, तुझ जैसे सस्ती धमकी देने वाले मैंने बहुत देखे हैं। तेरे पास गाड़ी थी, इसलिए बचकर निकल गया। वरना अपने जूते से तेरी ऐसी धुलाई करती कि जिन्दगी भर किसी को धमकी नहीं देता। यह बदला लेगा… हुह… एक लड़की से डरकर भाग गया।”
तारा काफी देर तक गुस्से में वहाँ बड़बड़ाती रही। आस-पास के लोग वहाँ रुककर उसे देख रहे थे।
उसने उन लोगों की ओर देखा और उन पर चिल्लाकर बोली, “यहाँ कोई कठपुतली का खेल चल रहा है क्या, जो रुककर देख रहे हो मुझे? जब मदद करनी होती है, तब तो कोई आता नहीं…”
“लगता है यह लड़की पागल हो गई है।” एक औरत ने पास वाली औरत से कहा।
“हाँ, हाँ, सही कहा। चलो, चलते हैं यहाँ से…” दूसरी औरत तारा की ओर मुँह बनाकर बोली और फिर वहाँ से चली गई।
“हाँ, तो जाओ ना… यहाँ से किसने कहा है, रुककर यहाँ मेरी बात सुनो।” तारा ने पीछे से चिल्लाकर जवाब दिया।
“गुस्से में मैं भूल ही गई थी कि ग्रीष्मा को चोट लगी थी। ध्रुव सर और ग्रीष्मा मेरा इंतज़ार कर रहे होंगे। मुझे जाना चाहिए।” तारा ने खुद से कहा और अपने कदम वापस बुटीक की ओर मोड़ लिए।
वहाँ जाकर उसने इधर-उधर देखा, तो उसे ध्रुव और ग्रीष्मा वहाँ दिखाई नहीं दिए। रिसेप्शनिस्ट से उसे पता चला कि वे दोनों वहाँ से जा चुके थे।
“अकेले छोड़कर चले गए मुझे… अरे, वो कोई मेरा पर्स चुराकर तो भागा नहीं था, जो मैं उसके पीछे दौड़कर गई थी। उन्हीं का फ़ायदा देखकर गई थी ताकि उस आदमी का पता लगा सकूँ। लेकिन ये दोनों तो मुझे ही यहीं छोड़कर चले गए। ज़रूर उस ध्रुव सिंघानिया ने ही मुझे यहाँ छोड़ा है। ग्रीष्मा ने तो ज़िद की होगी, लेकिन उस खड़ूस ने उसकी एक नहीं सुनी होगी।” तारा गुस्से में बड़बड़ा रही थी।
उसने अपना मोबाइल निकाला और साहित्य को कॉल किया।
“हेलो, तारा दीदी… साहित्य रिपोर्टिंग! वहाँ सब कुछ ठीक तो है ना? खड़ूस भाई ने आपको परेशान तो नहीं किया।” कॉल उठाते ही साहित्य बोला। साक्षी भी उसी के पास में थी।
“अगर उन्होंने आपको परेशान किया है, तो आप मुझे बताइए। हम तीनों मिलकर उन्हें ठीक कर देंगे।” साक्षी बोली।
“ऐसा कुछ नहीं हुआ है, साहित्य और साक्षी… मैं अभी तुम लोगों को ज़्यादा कुछ नहीं बता सकती, लेकिन तुम्हारा खड़ूस भाई मुझे बुटीक पर अकेला छोड़कर चला गया। ग्रीष्मा भी उन्हीं के साथ है। अब मैं अकेले घर कैसे आऊँ? मुझे तो पता भी नहीं है।” तारा ने परेशान होकर कहा।
“डोंट वरी, तारा दीदी, आपको हमारे होते हुए टेंशन लेने की ज़रूरत नहीं है। हम अभी बुटीक पहुँचते हैं।” साहित्य ने कहा और कॉल काट दिया।
“ज़रूर उस ग्रीष्मा का किया धरा है यह सब, वह ज़बरदस्ती भाई को ले गई होगी।” साक्षी ने कहा।
“यह सब बातें बाद में करेंगे, चलो पहले तारा दीदी को लेने चलते हैं।” साहित्य ने कहा और साक्षी के साथ बाहर आया।
बाहर उनकी माँ, रत्ना जी, उन्हीं की कंपनी की ज्वेलरी डिज़ाइनर के साथ बैठी कुछ ज्वैलरीज़ देख रही थीं। साहित्य और साक्षी उनकी नज़रों से छुपकर दबे पाँव बाहर जा रहे थे, लेकिन उन्होंने उन्हें देख लिया।
“डब्बू… चिंटू…” उन्होंने उन दोनों को आवाज़ लगाई। “ऐसे चोरों की तरह छुपकर तुम दोनों कहाँ जा रहे हो?”
“मम्मी, वो तारा दीदी बुटीक में अकेली है। ध्रुव भैया और ग्रीष्मा… आई मीन ग्रीष्मा भाभी उन्हें छोड़कर कहीं चले गए हैं।” साक्षी ने बताया।
“ध्रुव इतना लापरवाह तो नहीं हो सकता कि किसी लड़की को बीच रास्ते में छोड़कर चला जाए। कहीं तुम दोनों झूठ तो नहीं बोल रहे?” रत्ना जी ने आँखें दिखाकर कहा।
“नहीं मम्मी, माता रानी की कसम… हम झूठ नहीं बोल रहे। तारा दीदी सच में बहुत परेशान है। अब प्लीज़ हमें जाने दीजिए। हम ड्राइवर को लेकर जाएँगे।” साहित्य बोला।
रत्ना जी ने उन दोनों को वहाँ से जाने का इशारा किया। दोनों वहाँ से चले गए। उनके जाने के बाद रत्ना जी ने ज्वेलरी डिज़ाइनर को भी वहाँ से भेज दिया।
“ध्रुव ऐसे कैसे कर सकता है? ज़रूर वो लड़की झूठ बोल रही होगी… ध्रुव इतना लापरवाह तो नहीं कि ग्रीष्मा के साथ वक़्त बिताने के लिए उसे लड़की को ऐसे ही वहीं पर छोड़कर निकल जाए।” वो परेशान होकर इधर-उधर चहलकदमी करने लगी। उन्होंने ध्रुव को कॉल किया, लेकिन वह उनका फ़ोन नहीं उठा रहा था। इस बात ने उनकी परेशानी को और बढ़ा दिया।
साहित्य और साक्षी गाड़ी लेकर तारा के पास पहुँचे। वह उन दोनों के आने का इंतज़ार कर रही थी। तारा के मन में ध्रुव के लिए गुस्सा था।
उन दोनों को देखकर तारा जल्दी से उनके पास गई। “अच्छा हुआ जो तुम दोनों आ गए। वरना मुझे लगा कि यहाँ से सीधे अहमदाबाद की टिकट लेनी होगी।”
“आप क्या ऐसे बीच रास्ते हमें छोड़कर चली जाएँगी, तारा दीदी? आप ही तो हमारा आखिरी सहारा है।” साक्षी ने मुँह बनाकर कहा।
“बीच रास्ते में तो छोड़कर तुम्हारा भाई मुझे निकल गया… मिलने दो उसे… मैं बताती हूँ उसे, एक नंबर का सेल्फ़िश इंसान है वह…”
“लगता है मामला काफ़ी बिगड़ा हुआ है। फ़िलहाल के लिए घर चलते हैं, तारा दीदी। मम्मी इस बारे में सब जानती है, और आप हमारी मम्मी को जानते नहीं, अगर हम लोगों को छींक भी आ जाए तो वो परेशान हो जाती है। मतलब उन्हें हर छोटी बात पर बड़ी टेंशन लेने की आदत है।” साहित्य ने बताया।
तारा ने उनकी बात मान ली और उनके साथ घर आ गई। वहीं, ग्रीष्मा और ध्रुव भी घर पहुँच चुके थे। रत्ना जी ने अपनी परेशानी में सबको एक साथ इकट्ठा कर लिया था।
जैसे ही सरिता जी ने ग्रीष्मा के गले की चोट देखी, वो घबराकर उसके पास गई। “क्या हुआ? ध्रुव, ग्रीष्मा को यह चोट कहाँ से लगी? तुम दोनों तो साथ ही गए थे ना?”
“जवाब दो, ध्रुव, बुटीक से तारा का भी कॉल आया था कि तुम उसे अकेले छोड़कर कहीं चले गए हो।” रत्ना जी ने कहा।
“हाँ, हाँ, अब जवाब दो इन सब को कि मुझे छोड़कर कहाँ चले गए थे।” तारा ने गुस्से में ध्रुव की ओर देखा।
ध्रुव का उन सब की बातों की ओर बिल्कुल ध्यान नहीं था। उसका मन उस आदमी की ओर लगा हुआ था जिसने उसे धमकी दी थी। वह लगातार उसके बारे में सोचने की कोशिश कर रहा था, लेकिन उसे कुछ याद नहीं आ रहा था कि वह कौन था।
“जवाब दो, ध्रुव… सब कोई तुम्हारे से पूछ रहे हैं। ध्यान कहाँ है तुम्हारा?” गायत्री जी ने कड़क आवाज़ में कहा।
उनकी आवाज़ सुनकर ध्रुव का ध्यान टूटा। उसने खोई हुई आवाज़ में कहा, “मैं चाहता हूँ कि मेरी और ग्रीष्मा की शादी आने वाले तीन दिनों में हो।”
जैसे ही ध्रुव ने यह कहा, सब एक-दूसरे की ओर हैरानी से देखने लगे।
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