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Chapter 3

RUTHLESS MARTIAL SPIRIT EMPEROR - Chapter 3

RUTHLESS MARTIAL SPIRIT EMPEROR

रुद्र ने शांत भाव से कहा, "क्या तुम बेवकूफ हो?"

​कुणाल गुस्से से कांपने लगा, लेकिन कुछ कर नहीं पाया। उसने बस इतना कहा, "तू इंतज़ार कर!" और पैर पटकते हुए नीचे चला गया।

​किताबें दर्ज करवाने के बाद रुद्र अपने कमरे में लौटा।

​दो घंटे बाद...

​रुद्र मुस्कुराते हुए बाहर निकला और सीधे अभ्यास के लिए बने आँगन में गया। वहाँ लकड़ी के खंभे और पत्थर के स्तंभ लगे थे।

​एक पत्थर के स्तंभ के पास जाकर रुद्र ने 'अष्ट-दिशा प्रहार' का प्रयोग किया। उसकी मुट्ठी हवा को चीरती हुई सनसनाती आवाज़ के साथ आगे बढ़ी।

​"हा!"

​एक जोरदार धमाका हुआ और पत्थर का स्तंभ चूर-चूर होकर पाउडर में बदल गया।

​लेकिन यह अंत नहीं था। सामने वाले स्तंभ को तोड़ने के बाद भी मुट्ठी की हवा आगे बढ़ती गई और दो मीटर दूर खड़े दूसरे स्तंभ से जा टकराई। दूसरा स्तंभ भी धमाके के साथ फट गया।

​"कम से कम हज़ार किलो की ताकत!" रुद्र बेहद संतुष्ट था। तीसरे स्तर पर होने के बावजूद, इस तकनीक की मदद से वह इतनी भयानक चोट दे सकता था।

​"अब त्रिकुट पर्वत शृंखला जाने का समय आ गया है!" रुद्र ने दूर फैले पहाड़ों की ओर देखा।

​मठ के पीछे फैले ये पहाड़ हज़ारों मील तक जाते थे, जहाँ अनगिनत जड़ी-बूटियाँ और खतरनाक जानवर थे। अपनी साधना को पक्का करने के लिए उसे वहाँ जाना ही था।

​रुद्र ने बिना देर किए अपना सामान बांधा और निकल पड़ा।

​त्रिकुट पर्वत खतरनाक था, लेकिन अपनी देह-शुद्धि को मज़बूत करने के लिए उसे कुदरती खज़ानों की ज़रूरत थी। उसका शरीर अब भी पूरी तरह स्थिर नहीं था, और उसे सुधारने के लिए जड़ी-बूटियों का रस चाहिए था।

​हरे-भरे पहाड़ी रास्ते पर चलते हुए, उसे अचानक किसी के हँसने की आवाज़ सुनाई दी। आवाज़ जानी-पहचानी थी।

​पास ही एक छोटी झील के किनारे बने पुराने मंडप में एक युवक और युवती खड़े थे। वे ऐसे बात कर रहे थे जैसे कोई प्रेमी जोड़ा हो।

​युवती बेहद खूबसूरत थी, हरी पोशाक में वह किसी अप्सरा से कम नहीं लग रही थी।

​यह युवती कोई और नहीं, रुद्र की मंगेतर, मीरा थी।

​मीरा, रायगढ़ के एक छोटे परिवार से थी। बचपन में ही रुद्र के पिता ने उसकी सगाई रुद्र से तय कर दी थी और उसके परिवार की मदद की थी, जिससे वे ताकतवर हो गए थे। इसी साल के अंत में उनकी शादी होने वाली थी।

​मीरा के साथ जो युवक था, वह कुणाल था—वही रुद्र का चचेरा भाई, जिसने चार-सितारा आत्मा-शक्ति जगाई थी और देह-शुद्धि के चौथे स्तर पर था।

​रुद्र को देखते ही दोनों सकपका गए।

​"मीरा, तुम इसके साथ क्यों हो?" रुद्र ने ठंडे स्वर में पूछा।

​मीरा घबरा गई और मदद के लिए कुणाल की ओर देखने लगी।

​कुणाल ने मीरा का हाथ थपथपाया और हँसा, "रुद्र, तुम सही समय पर आए हो। मैं तुम्हें बता दूँ कि मीरा अब मेरी है। आज के बाद तुम उससे नहीं मिलोगे, वरना... तुम जानते हो क्या होगा।"

​रुद्र ने कुणाल को नज़रअंदाज़ किया और मीरा को घूरते हुए कहा, "मीरा...!"

​कुणाल की आँखों में गुस्सा आ गया, "अपनी औकात मत भूल रुद्र। तुम एक नकारा हो, मीरा के लायक नहीं।"

​कुणाल की बातों से मीरा में भी हिम्मत आ गई। उसने तुच्छ नज़रों से रुद्र को देखा, "हाँ, कुणाल सही कह रहे हैं। मैं सिर्फ़ इन्हें पसंद करती हूँ।"

​रुद्र ने शांत रहकर पूछा, "क्यों? सिर्फ़ इसलिए कि मेरी आत्मा-शक्ति नहीं जागी थी?"

​मीरा ने बिना शर्म के कहा, "हाँ, तुम्हारी प्रतिभा बहुत कमज़ोर है। कुणाल एक जीनियस हैं और तुम... तुम तो मठ से निकाले जाने वाले हो।"

​"तीन-सितारा आत्मा-शक्ति... जीनियस..." रुद्र ने हल्का सा हँसते हुए सिर हिलाया।

​"बहुत अच्छे!"

​ऐसी औरत को साथ रखने का कोई मतलब नहीं था।

​रुद्र मुड़ा और दो कदम चलकर रुक गया। बिना पीछे देखे उसने कहा, "मीरा, आज जो तुमने कहा है, उसे याद रखना!"

​इतना कहकर वह सीधा त्रिकुट पर्वत की ओर बढ़ गया। उसकी चाल में कोई हिचकिचाहट नहीं थी।

​मीरा उसे जाते हुए देखती रही। उसे लगा था कि रुद्र रोएगा, गिड़गिड़ाएगा। लेकिन उसका यह शांत रूप उसे खटक गया। उसने खुद को समझाया, "याद रखना? क्या फ़ायदा? क्या मैं पछताऊँगी? बकवास!"

​रुद्र सीधे उन पहाड़ों की ओर बढ़ा जिन्हें मठ ने प्रतिबंधित क्षेत्र घोषित किया था।

​यहाँ की हवा में एक अलग ही ऊर्जा थी। ऊँचे-ऊँचे पेड़, घनी झाड़ियाँ और फूलों की महक। रुद्र का मन शांत होने लगा।

​तभी, "ग्रार्रर...!"

​एक जोरदार दहाड़ गूंजी और एक पेड़ के पीछे से एक जानवर कूदकर सामने आ गया।

​"खूनी बाघ?"

​यह जानवर दो मीटर ऊंचा था, जिसके शरीर पर पीली और सफेद धारियाँ थीं। उसकी लाल आँखें रुद्र को घूर रही थीं। उसके पंजे किसी बड़े बर्तन जितने विशाल थे।

​यह 'खूनी बाघ' देह-शुद्धि के तीसरे स्तर के योद्धा के बराबर ताकतवर था।

​रुद्र और बाघ एक-दूसरे को घूरते रहे।

​अचानक, रुद्र ने अपना बायां पैर ज़मीन पर पटका।

​इस हरकत ने बाघ को भड़का दिया। वह गुर्राया और हवा में छलांग लगाकर सीधा रुद्र की ओर झपटा। उसका मुँह खुला था, जिसमें से खून की बदबू आ रही थी और नुकीले दाँत चमक रहे थे।

​रुद्र अपनी जगह से हिला नहीं, बस ऐन मौके पर बायीं ओर झुका और अपनी पूरी ताकत से दायां मुक्का चलाया।

​उसका मुक्का हवा को चीरता हुआ सनसनाया...

​"धड़ाम!"

​एक भयानक आवाज़ के साथ, खूनी बाघ का शरीर हवा में ही फट गया।

​अष्ट-दिशा प्रहार—एक वार, और शरीर के चिथड़े उड़ गए।

​"यह तकनीक वाकई दमदार है!" रुद्र ने ख़ुशी महसूस की।

​उसने तय किया कि उसे इस तकनीक को और आगे बढ़ाना होगा। उसने जंगल की गहराई में एक झरना देखा, जो दस मीटर की ऊंचाई से गिर रहा था।

​"यह जगह सही है!" रुद्र ने आस-पास देखा और कपड़े उतारकर झरने के नीचे खड़ा हो गया।

अष्ट-दिशा प्रहार, मुट्ठियाँ उल्कापिंड की तरह बरस रही थीं और उनमें छिपी थी एक घातक शक्ति।

रुद्र की आँखें कसकर बंद थीं। गुप्त किताब में लिखे दांव-पेंच उसके दिमाग में बिजली की तरह कौंध रहे थे। अचानक उसने अपनी मुट्ठी उठाई और पूरी ताकत से पानी पर दे मारी। उसका दाहिना हाथ इतना तेज़ था कि वह एक धुंधला सा साया बन गया।

ऊंचाई से गिरते हुए झरने में गज़ब की ताकत थी। रुद्र अभी देह-शुद्धि स्तर के तीसरे पड़ाव पर था, उसकी प्राण-ऊर्जा से भरा वो मुक्का झरने के बीच में सिर्फ एक बड़ा सा छेद ही बना पाया, जो पल भर में पानी से फिर भर गया। लेकिन रुद्र रुका नहीं। वह गिरते हुए पानी पर एक के बाद एक घूंसे बरसाता रहा। हर वार पूरी शिद्दत के साथ, हर मुक्का पूरी एकाग्रता के साथ।

देखते ही देखते तीन दिन बीत गए। रुद्र सुध-बुध खोकर बस अभ्यास में लीन था। उसने झरने पर हज़ारों-लाखों मुक्के बरसा दिए थे। उसकी आँखें हल्की लाल हो चुकी थीं। वह अपने मन में दहाड़ा, "नहीं... अभी भी नहीं... अभी भी कुछ कमी है!"

उसके चिल्लाने की आवाज़ जितनी तेज़ होती, उसके हाथ उतनी ही तेज़ी से चलते। रुद्र का ध्यान पूरी तरह अपने लक्ष्य पर था, इसलिए उसे एहसास ही नहीं हुआ कि उसके ठीक पीछे एक धुंधली आकृति धीरे-धीरे आकार ले रही थी।

वह उसकी 'श्वेत-बाघ आत्मा-शक्ति' थी।

जैसे रुद्र के मन की स्थिति बदली, उस नन्ही बिल्ली जैसी दिखने वाली आत्मा-शक्ति का आकार बढ़ने लगा और वह अपने असली श्वेत-बाघ रूप में आने लगी। श्वेत-बाघ, धातु तत्व का एक दिव्य जानवर और संहार का स्वामी। उसे बढ़ने के लिए सिर्फ हवा और ज़मीन की प्राण-ऊर्जा नहीं चाहिए थी, उसे चाहिए था—युद्ध का जुनून और मारने की इच्छा। और इस वक्त, रुद्र के अंदर से उबलते हुए युद्ध के जुनून को महसूस करके वह अपने आप प्रकट हो गया था।

रुद्र के पीछे हवा में तैरती श्वेत-बाघ आत्मा-शक्ति की सुनहरी आँखों से हज़ारों किरणें निकल रही थीं, जिन्होंने पीछे के पूरे आसमान को सुनहरा कर दिया था। रुद्र का शरीर अपनी सीमा तक पहुँच चुका था। उसके दोनों हाथ और मांसपेशियां दर्द से फट रही थीं, लेकिन उसके मुक्के नहीं रुके। रुद्र के चरित्र की यही खासियत थी—अगर उसने कुछ ठान लिया, तो उसे कोई रोक नहीं सकता था।

अचानक, उसके दिमाग में एक बिजली सी कौंधी। रुद्र, जो अगला मुक्का मारने ही वाला था, एकदम से ठिठक गया। उसके चेहरे पर हैरानी थी। "यह... हाँ! यही तो है!"

उसने धीरे से अपना हाथ नीचे किया और आँखें मूंद लीं। वह उस एक पल की स्पष्टता को पकड़ने की कोशिश करने लगा। वह पूरे चार घंटे तक वैसे ही खड़ा रहा।

अचानक उसके दिमाग में एक हल्की सी घंटी बजी। रुद्र ने झटके से आँखें खोलीं। "तो यह राजज़ है!"

बिना एक पल गंवाए उसने मुक्का चलाया। इस बार कोई आवाज़ नहीं हुई। उसका दाहिना हाथ बिजली की रफ़्तार से चला और सामने गिरते हुए विशाल झरने को बीच से चीर दिया। पानी की बौछारें हर तरफ उड़ गईं।

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