RUTHLESS MARTIAL SPIRIT EMPEROR - Chapter 5
RUTHLESS MARTIAL SPIRIT EMPERORरुद्र की श्वेत-बाघ आत्मा-शक्ति, जो अब एक बड़े जानवर के आकार की थी, भैरव की 'काले धब्बों वाली बाघ' आत्मा-शक्ति को देखकर गुर्राई। वह रुद्र के शरीर से अलग हुई और सीधे उस पर झपट पड़ी।
उसने अपने पंजे से भैरव की आत्मा-शक्ति को एक झटके में बिखेर दिया और फिर अपना मुंह खोलकर उसे किसी धुएं की तरह अपने अंदर खींच लिया।
रुद्र सन्न रह गया। "यह... यह तो अपनी ही तरह की दूसरी आत्मा-शक्तियों को भी खा जाती है...!"
दूसरे बाघ की आत्मा को खाने के बाद, श्वेत-बाघ आत्मा-शक्ति ने ज़ोरदार दहाड़ लगाई। उसके माथे पर पांचवां सितारा जगमगा उठा।
"पांच सितारे...?"
रुद्र का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। अगर उसकी आत्मा-शक्ति दूसरों की आत्मा-शक्तियों को खाकर अपने सितारे बढ़ा सकती है, तो इसका मतलब है कि उसकी बाकी सोई हुई आत्मा-शक्तियों को भी जगाया जा सकता है! और सबसे बड़ी बात, जैसे ही उसकी आत्मा-शक्ति पांच सितारों वाली बनी, रुद्र के शरीर में भी एक विस्फोट हुआ। उसकी साधना ने सीधे छलांग लगाई और वह 'देह-शुद्धि स्तर पांच' पर पहुँच गया!
रुद्र ने बिना पीछे मुड़े गुफा छोड़ दी। भैरव की बिना सिर वाली लाश और उसकी खाई हुई आत्मा अब इतिहास बन चुकी थी। जो उसे मारने आएगा, रुद्र उसे छोड़ेगा नहीं।
रुद्र फिर से जंगल में शिकार करने निकल पड़ा। अब वह एक-एक मुक्के से स्तर चार और पांच के जानवरों को ढेर कर रहा था। लेकिन उसे निराशा हाथ लगी, क्योंकि उसकी श्वेत-बाघ आत्मा-शक्ति ने उन जानवरों को खाने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई।
"लगता है यह सिर्फ खास तरह की चीज़ें या आत्मा-शक्तियां ही खाती है," रुद्र ने सोचा।
तभी, हवा के साथ इंसानी आवाज़ें उसके कानों तक पहुंचीं। स्तर पांच पर पहुँचने के बाद उसकी सुनने की शक्ति बहुत तेज़ हो गई थी। वह सौ मीटर दूर की आहट भी सुन सकता था।
रुद्र ने अपनी उपस्थिति छिपाई और आवाज़ की दिशा में तेज़ी से बढ़ा। जंगल को पार करते ही उसे एक लड़ाई का मंज़र दिखाई दिया।
एक नज़र डालते ही रुद्र की आँखें फैल गईं और उसका चेहरा पीला पड़ गया। उसके शरीर से प्राण-ऊर्जा किसी तूफ़ान की तरह फूट पड़ी। वह एक परछाई बनकर उस दिशा में दौड़ा।
वहाँ खून से लथपथ जो शख्श ज़मीन पर पड़ा था, वह चेहरा इतना जाना-पहचाना था कि रुद्र का दिल दहल गया।
उसकी आँखों के सामने खून से लथपथ वो जिस्म था, जिसे वो हज़ारों की भीड़ में भी पहचान सकता था। उसका सगा बड़ा भाई, रणवीर।
तभी एक जोरदार दहाड़ गूंजी। रणवीर के शरीर पर झपटने को तैयार उस 'हरी आँखों वाले तूफानी भेड़िये' से रुद्र अभी कुछ कदम दूर ही था कि उसकी प्राण-ऊर्जा अपने चरम पर पहुँच गई। उसका 'अष्ट-दिशा प्रहार' पूरी ताकत के साथ फूटा।
हवा को चीरता हुआ उसका मुक्का सीधे हवा में उछले उस भेड़िये पर जा लगा। एक जोरदार धमाका हुआ, जैसे आसमान में बिजली कड़की हो। वो विशाल भेड़िया किसी उल्कापिंड की तरह दूर जा गिरा और कई मोटे पेड़ों को तोड़ता हुआ ज़मीन पर ढेर हो गया। उसकी नाक और मुँह से खून बह निकला, उसके बचने की अब कोई उम्मीद नहीं थी।
रुद्र ने उस जानवर की परवाह नहीं की और तुरंत अपने भाई को गोद में उठा लिया।
"भैया, आप... आप यहाँ कैसे?" रुद्र की आवाज़ कांप रही थी।
रणवीर का चेहरा पीला पड़ चुका था और होंठों पर खून जमा था, लेकिन रुद्र को देखते ही उसकी आँखों में एक चमक आ गई। उसने कांपते हाथों से रुद्र की बांह पकड़ ली।
"मैं... तुम्हें ही ढूँढने आया था। घर पर... कुछ गड़बड़ है!"
इतना कहकर रणवीर का सिर एक तरफ लुढ़क गया और वो बेहोश हो गया। रुद्र का दिल बैठ गया। उसने जल्दी से रणवीर के शरीर की जाँच की। घाव इतने गहरे थे कि हड्डियाँ तक नज़र आ रही थीं। रुद्र की भौहें तन गईं।
हालाँकि रणवीर भी देह-शुद्धि स्तर का योद्धा था और उसने अपनी आत्मा-शक्ति को जागृत कर लिया था, लेकिन ये चोटें अंदरूनी और जानलेवा थीं। रुद्र ने बिना एक पल गँवाए अपने भाई को पीठ पर लादा। उसने अपनी प्राण-ऊर्जा को पैरों में समेटा और पहाड़ी से नीचे मठ की ओर दौड़ लगा दी।
दिव्य-शक्ति मठ के कमरे में सन्नाटा पसरा था।
मठ के वैद्य ने, जिन्हें एक कीमती दानव-क्रिस्टल देकर बुलाया गया था, रणवीर को देखते ही निराशा में सिर हिला दिया।
"घाव बहुत गहरे हैं..."
सफेद कपड़े पहने वैद्य ने अपने थैले से कई तरह की शीशियाँ निकालीं और रणवीर के सत्रह अलग-अलग घावों पर रंग-बिरंगा औषधीय पाउडर छिड़कना शुरू कर दिया।
रुद्र की बेचैनी बढ़ती जा रही थी। उसने पूछा, "क्या कोई और रास्ता नहीं है?"
रुद्र बचपन से ही अपने परिवार और कबीले के लिए एक मज़ाक का पात्र रहा था, लेकिन यह रणवीर ही था जिसने हमेशा ढाल बनकर उसकी रक्षा की थी। रुद्र के वीरान बचपन में अगर कोई उम्मीद की किरण थी, तो वो उसका बड़ा भाई रणवीर ही था। इस शरीर में मौजूद रुद्र की आत्मा भी उस भाई के प्यार को महसूस कर सकती थी।
वैद्य ने घावों पर पट्टी बांधते हुए, माथे का पसीना पोंछा और कहा, "इसे बचाने के लिए... कम से कम पाँचवें दर्जे की औषधि की ज़रूरत होगी।"
"पाँचवें दर्जे की औषधि!" रुद्र को जैसे झटका लगा। उसका पूरा शरीर सिहर उठा।
आर्यावर्त खंड में योद्धाओं का सम्मान तो था, लेकिन कीमयागरों और वैद्यों का दर्जा उनसे हज़ारों गुना ऊपर था। जड़ी-बूटियों से बनी उनकी गोलियाँ चमत्कार कर सकती थीं, लेकिन उनकी कीमत आसमान छूती थी।
रुद्र को याद आया कि जिस भैरव को उसने मारा था, उसने केवल एक दूसरे दर्जे की 'चेतना-रस गोली' हासिल करने के लिए अपनी पूरी दौलत लुटा दी थी। और यहाँ बात पाँचवें दर्जे की हो रही थी। पाँचवें दर्जे की गोली तो दूर, पहले दर्जे की गोली खरीदना भी रुद्र की हैसियत से बाहर था।
वैद्य ने अपना काम खत्म किया और रुद्र के उतरे हुए चेहरे को देखकर एक गहरी सांस ली।
"अगर तुम सच में इसे बचाना चाहते हो, तो सिर्फ़ एक ही रास्ता है..."
रुद्र की आँखों में उम्मीद की एक चिंगारी जली। "क्या?"
वैद्य ने धीरे से कहा, "दिव्य-शक्ति मठ का 'स्वर्ण शिखर'।"
स्वर्ण शिखर... मठ की बारह मुख्य चोटियों पर स्थित वो बारह स्थान, जिन्हें मठ के 'तीन प्रतिबंधित क्षेत्रों' में गिना जाता था।
वहाँ जाने वाले दस शिष्यों में से नौ की मौत निश्चित थी, और जो एक बचता, वो भी अधमरा होकर लौटता। इसका खौफ इतना था कि कोई उसका नाम भी नहीं लेता था। लेकिन खतरा जितना बड़ा था, इनाम भी उतना ही शानदार था।
जो कोई भी स्वर्ण शिखर की परीक्षाओं को पार कर लेता, वो सीधा मठ का मुख्य शिष्य बन जाता। उसे वो सब कुछ मिल सकता था, जिसकी उसे चाहत हो।
वैद्य की बात पूरी होते ही रुद्र ने कहा, "धन्यवाद, गुरुवर!" और वह तेज़ी से कमरे से बाहर निकल गया।
मठ की सबसे ऊँची मुख्य चोटी पर एक प्राकृतिक पत्थर की गुफा थी, जो स्वर्ण शिखर का प्रवेश द्वार थी।
रुद्र उस गुफा के मुहाने पर खड़ा था। उसने ज़ोर से आवाज़ लगाई, "बाहरी शिष्य रुद्र, 'स्वर्ण शिखर' की परीक्षा देना चाहता है!"
अंधेरी गुफा के भीतर से एक भारी गूँजती हुई आवाज़ आई, "भीतर आ जाओ!"
रुद्र ने गहरी साँस ली और अंदर कदम बढ़ा दिया। गुफा के अंदर एक धीमी रोशनी थी। चलते-चलते वो एक कमरे जैसी जगह पर पहुँचा। वहाँ पत्थर की मेज़ पर एक दीिया जल रहा था और सुनहरे लबादे में एक बुज़ुर्ग किताब पढ़ने में मग्न थे।
बुज़ुर्ग ने किताब नीचे रखी और रुद्र की ओर देखा। "तुम स्वर्ण शिखर पर क्यों जाना चाहते हो?"
रुद्र ने बिना डरे, हाथ जोड़कर जवाब दिया, "एक जान बचाने के लिए, मुझे पाँचवें दर्जे की औषधि चाहिए।"
सुनहरे लबादे वाले बुज़ुर्ग की आँखें चमकीं। उन्होंने रुद्र को ऊपर से नीचे तक देखा, जैसे उसकी रूह को टटोल रहे हों।
"पाँचवें दर्जे की औषधि कोई बड़ी बात नहीं है, लेकिन... तुम अभी देह-शुद्धि के पाँचवें स्तर पर हो। इस परीक्षा को पास करने की कोई संभावना नहीं है।"
"मैं सिर्फ़ कोशिश करना चाहता हूँ!" रुद्र की आवाज़ में एक अजीब-सी जिद्द थी।
बुज़ुर्ग ने उसकी दृढ़ता देखी तो उनके होंठों पर हल्की मुस्कान आ गई। उन्होंने सिर हिलाया और अपने पीछे इशारा करते हुए कहा, "बाईं ओर दूसरा रास्ता पकड़ लो, जाओ!"
"धन्यवाद, बुज़ुर्ग!"
रुद्र ने देखा कि वहाँ कुल बारह रास्ते थे, जो अलग-अलग शिखरों की ओर जाते थे। उसने बिना एक पल की देरी किए, बुज़ुर्ग के बताए रास्ते की ओर कदम बढ़ा दिए और अंधेरे में ओझल हो गया।
उसके जाने के बाद बुज़ुर्ग ने वापस अपनी किताब उठाई और धीरे से बुदबुदाए, "पाँच-सितारा आत्मा-शक्ति... अफ़सोस... बड़ा अफ़सोस..."
जिस रास्ते पर उन्होंने रुद्र को भेजा था, उसका नाम था 'नव-मेघ गर्जना'। यह सबसे खतरनाक रास्तों में से एक था, लेकिन इसकी खासियत यह थी कि यह खुद होकर हमला नहीं करता था। बुज़ुर्ग ने उसे जानबूझकर वहाँ भेजा था, ताकि रुद्र वहाँ का खौफ देखकर अपनी जान बचाकर वापस लौट आए।
रास्ता बेहद लंबा और थका देने वाला था। करीब आधे घंटे तक लगातार चलने के बाद रुद्र एक भारी-भरकम पत्थर के दरवाज़े के सामने पहुँचा।
जैसे ही रुद्र नज़दीक आया, वह पत्थर का दरवाज़ा धीरे-धीरे खुलने लगा। भीतर से आती तेज़ और चकाचौंध कर देने वाली रौशनी ने उसकी आँखों को सिकोड़ने पर मजबूर कर दिया।
दरवाज़ा खुलते ही प्राण-ऊर्जा का एक ज़बरदस्त तूफ़ान बाहर की ओर लपका, जिससे रुद्र के शरीर में मौजूद उसकी अपनी प्राण-ऊर्जा अपने-आप उबलने लगी।
यह एक ऊँचा चबूतरा था, जो पहाड़ की सबसे ऊँची चोटी पर बना एक प्राचीन ढाँचा लग रहा था। चबूतरे के ठीक बीचो-बीच हवा में एक नीली तलवार तैर रही थी, जो धीरे-धीरे ऊपर-नीचे हो रही थी। उस तलवार की रखवाली कर रहे थे नौ विशाल बिजली के खंभे। ये खंभे किसी विशालकाय पेड़ की तरह ज़मीन से सीधे आसमान की ओर तने हुए थे और उनमें से बिजली कड़कने की भयंकर आवाज़ें आ रही थीं।
रुद्र हैरानी से उन नौ बिजली के खंभों और उनके बीच चमकती उस तलवार को देख रहा था।
तभी उसकी नज़र बाईं ओर गड़े एक पत्थर के शिलालेख पर पड़ी, जिस पर सुनहरे अक्षरों में कुछ लिखा था।
" 'नव-मेघ गर्जना' की परीक्षा पास करने के लिए, साधक को 'वज्र-प्रहार तलवार कला' का उपयोग करके इन बिजली के खंभों को काटना होगा!"
"वज्र-प्रहार तलवार कला?" रुद्र ने देखा कि शिलालेख के पास ही एक नीली गुप्त-पुस्तिका और एक साधारण सी तलवार रखी थी।
उसने पुस्तिका उठाई और उसे ध्यान से पढ़ने लगा।
"हज़ारों मील तक गूँजती गरज, दस हज़ार मील तक चमकती बिजली... यह गरज की तरह आती है और बिजली की तरह जाती है... जब इसकी साधना थोड़ी भी सिद्ध हो जाए, तो इसका वेग बादलों की गड़गड़ाहट जैसा और वार गिरती हुई बिजली जैसा होता है... इसे 'तेरह वज्र तलवारें' कहा जाता है।"
"क्या ज़बरदस्त तलवार कला है! और यह सिर्फ़ एक पीत-श्रेणी की उच्च-स्तरीय कला है..." रुद्र ने पुस्तिका बंद की और तलवार को अपने हाथ में थाम लिया। उसने धीरे से अपनी आँखें बंद कर लीं। पुस्तिका में बताया गया पहला पैंतरा उसके दिमाग में किसी चित्र की तरह उभरने लगा।
"पहला पैंतरा - म्यान से वार... जैसे ही विचार कौंधे, तलवार चलनी चाहिए; और जब तलवार चले, तो वो जानलेवा होनी चाहिए! यही है म्यान से वार की कला!"
रुद्र ने अपनी प्राण-ऊर्जा को तलवार में प्रवाहित किया। कलाई के एक हल्के से झटके के साथ, तलवार से एक झनझनाहट की आवाज़ आई।
"खन्न..."
रुद्र की आँखें अचानक खुलीं और उसने थोड़ी दूर रखी बारह 'तलवार-परीक्षण शिलाओं' की ओर देखा। पलक झपकते ही तलवार म्यान से बाहर निकली और बिजली की गति से आदमकद पत्थर की ओर लपकी।
"डिंग!"
एक हल्की सी आवाज़ हुई। पत्थर की थोड़ी सी धूल उड़ी और हवा में गायब हो गई, लेकिन उस सख्त पत्थर पर एक खरोंच तक नहीं आई।