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Chapter 15

RUTHLESS MARTIAL SPIRIT EMPEROR - Chapter 15

RUTHLESS MARTIAL SPIRIT EMPEROR

प्रचंड श्रेणी का जानवर! रुद्र हैरान रह गया। उसे उम्मीद नहीं थी कि महेन्द्र इतना ताकतवर होगा कि वह ऐसे जानवर का शिकार कर सके, जिसकी ताकत देह-शुद्धि स्तर के सातवें चरण के माहिर के बराबर होती है। यह ताकत तो दिव्य-शक्ति मठ के कई आचार्यों से भी ज़्यादा थी।

"पालथी मारकर बैठो, मैं तुम्हारे घाव भरने में मदद करूँगा," रुद्र ने कहा। हालाँकि उसके मन में कई सवाल थे, लेकिन महेन्द्र का पीला चेहरा बता रहा था कि पहले उसका इलाज ज़रूरी है।

"यह कैसे हो सकता है? उस चंद्र-कालसर्प ने मुझे बहुत बुरी तरह मारा है। मेरी नसें टूट चुकी हैं, इनका जुड़ना मुश्किल है," महेन्द्र ने हिचकिचाते हुए कहा।

एक योद्धा के लिए उसका नाभि-चक्र और नसें सबसे कीमती होती हैं। अगर ये एक बार खराब हो जाएँ, तो बिना किसी दुर्लभ जड़ी-बूटी या कीमती गोली के इनका ठीक होना नामुमकिन होता है।

"चिंता मत करो," रुद्र ने सिर हिलाया, "जब तुम बेहोश थे, मैंने तुम्हें तीसरे दर्जे की गोली दी थी। तीन दिन के अंदर तुम्हारी नसें जुड़ जाएँगी।"

"क्या?! तीसरे दर्जे की गोली?!" महेन्द्र सन्न रह गया। उसे रुद्र की बात पर शक नहीं था, बस इस बात का अचंभा था कि इतनी कम उम्र में रुद्र के पास इतनी कीमती गोली कहाँ से आई।

"पहले बैठ जाओ! मैं दवा को तुम्हारे शरीर में घुलने में मदद करता हूँ," रुद्र ने हल्के से मुस्कुराते हुए कहा।

महेन्द्र ने तुरंत सिर झुकाया और रुद्र की तरफ पीठ करके बैठ गया। रुद्र ने अपनी हथेलियाँ उसकी पीठ पर टिका दीं और अपनी प्राण-ऊर्जा को उसके शरीर में प्रवाहित करना शुरू कर दिया। महेन्द्र ने भी अपनी साँसें साधीं और ऊर्जा को सही दिशा देने लगा।

काफी देर बाद, रुद्र ने धीरे-धीरे अपनी ऊर्जा वापस खींची, एक लंबी साँस छोड़ी और माथे से पसीना पोंछा।

महेन्द्र अब खुद ध्यान में लीन होकर अपने घाव भर रहा था, यह देखकर रुद्र कमरे से बाहर निकलकर छोटे आंगन में आ गया।

तभी एक सफेद परछाई रुद्र की तरफ लपकी। वह जामुनी दिव्य भालू का नन्हा बच्चा था, जो अपने छोटे-छोटे पैरों पर दौड़ता हुआ, उत्साह से चीखता हुआ रुद्र के पास आया।

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"यह तो भालू का पित्त है!"

रुद्र ने नन्हे भालू के मोटे पंजों में रखे भालू के पित्त को देखा और हैरान रह गया।

उसे उम्मीद नहीं थी कि यह नन्हा जीव अपनी ही प्रजाति के जानवर का शिकार करेगा और उसे एक कीमती तोहफे की तरह रुद्र को सौंपेगा। उसकी आँखों में एक उम्मीद थी, जैसे वह रुद्र से तारीफ सुनना चाहता हो। इस मासूमियत ने रुद्र का दिल जीत लिया।

"लगता है तुमने काफी शिकार किया है। तुम्हारा शरीर भी पहले से थोड़ा बड़ा हो गया है! इस तोहफे के लिए शुक्रिया," रुद्र ने मुस्कुराते हुए नन्हे भालू के सिर पर हाथ फेरा।

नन्हे भालू को रुद्र का प्यार बहुत पसंद आया। उसने अपना सिर रुद्र के हाथ से रगड़ा और मस्ती में अपनी आँखें सिकोड़ लीं।

थोड़ी देर उसके साथ खेलने के बाद, वह नन्हा जीव फिर से पीछे की त्रिकुट पर्वत शृंखला की ओर भाग गया। रुद्र के पीछे आने के बाद भी वह अपना ज़्यादातर समय जंगलों में ही बिताता था। अपनी पीली-श्रेणी की आठ-सितारा ताकत के साथ, बाहरी जंगल में उसका मुकाबला करने वाला कोई नहीं था।

उसकी सफेद आकृति को ओझल होते देख रुद्र मुस्कुराया और फिर मठ के अभ्यास-कक्षों की ओर चल पड़ा।

दिव्य-शक्ति मठ में एक हज़ार से ज़्यादा अभ्यास-कक्ष थे, जिनकी सबसे बड़ी खासियत थी वहाँ की शांति। आचार्यों की पहरेदारी के कारण वहाँ साधना करते वक्त कोई किसी को परेशान नहीं कर सकता था।

रुद्र की आत्मा-शक्ति का विकास इस वक्त बेहद ज़रूरी था, इसलिए उसने दस सोने के सिक्कों वाला एक कक्ष चुना।

जैसे ही वह पूर्वी तरफ के अभ्यास-कक्षों के प्रवेश द्वार पर पहुँचा, एक बैंगनी वस्त्र पहने शख़्स ने उसका रास्ता रोक लिया। उसके चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान थी।

"रुद्र, इस साल की तुम्हारी देह-शुद्धि गोलियाँ लेने का समय निकल चुका है। मैंने वो किसी और को दे दीं। याद रखना, अगले साल देर मत करना। अरे हाँ, मैं तो भूल ही गया था, कुछ दिनों में तो तुम्हें मठ से धक्के मारकर निकाल दिया जाएगा, तो अगले साल का मौका ही कहाँ मिलेगा।"

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रुद्र ने ऊपर देखा। वह बैंगनी वस्त्र वाला बुजुर्ग कोई और नहीं, आचार्य लोकेश थे—दिव्य-शक्ति मठ के सबसे होनहार शिष्य, नील के गुरु।

"आचार्य लोकेश, क्या आपने मेरी गोलियाँ नील को दे दीं?" रुद्र ने माथे पर शिकन लाते हुए पूछा।

"हूँ! दे दीं तो क्या हुआ? तुम, एक बाहरी शिष्य, मुझसे सवाल करने की जुर्रत करोगे?" आचार्य लोकेश के चेहरे पर घृणा साफ़ थी।

"सवाल?" रुद्र ने तंज़ कसते हुए कहा, "मेरी गोलियाँ आपने जबरदस्ती हथिया लीं, क्या मुझे पूछने का हक भी नहीं?"

"हूँ! एक कचरा, अगर आत्मा-शक्ति जाग भी गई तो क्या उखाड़ लेगा? मठ के संसाधनों की बर्बादी हो तुम!" लोकेश ने ऐसे कहा जैसे वह जो कर रहा है वह पूरी तरह सही हो, उसके चेहरे पर शर्म की कोई लकीर नहीं थी।

रुद्र ने धीरे से सिर हिलाया। अपनी जेब से दस सोने के सिक्के निकाले और मेज़ पर फेंक दिए। बिना कुछ कहे एक नंबर प्लेट उठाई और सीधा अभ्यास-कक्ष की तरफ बढ़ गया।

"तुम..."

रुद्र को इग्नोर करते देख आचार्य लोकेश का बूढ़ा चेहरा गुस्से से लाल हो गया। उसकी आँखों में ज़हर उतर आया।

"रुद्र, मठ की प्रतियोगिता में होने वाला 'जीवन-मृत्यु' का मुकाबला तुम्हारा आखिरी दिन होगा। मैं नील के हाथों तुम्हें मरवा डालूँगा!"

रुद्र के कदम ठिठके, लेकिन वह पलटा नहीं। आचार्य लोकेश की तरफ पीठ किए हुए ही उसने कहा,

"अगर उसमें दम है, तो उसे कहो आकर मुझे मार ले!"

लोकेश को वहीं छोड़कर, रुद्र अभ्यास-कक्षों के गलियारे में गहराइयों की तरफ बढ़ गया, एक एकांत कमरा चुना और दरवाज़ा बंद कर लिया।

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