RUTHLESS MARTIAL SPIRIT EMPEROR - Chapter 6
RUTHLESS MARTIAL SPIRIT EMPERORरुद्र की आँखें अचानक खुलीं और उसने थोड़ी दूर रखी बारह 'तलवार-परीक्षण शिलाओं' की ओर देखा। पलक झपकते ही तलवार म्यान से बाहर निकली और बिजली की गति से आदमकद पत्थर की ओर लपकी।
"डिंग!"
एक हल्की सी आवाज़ हुई। पत्थर की थोड़ी सी धूल उड़ी और हवा में गायब हो गई, लेकिन उस सख्त पत्थर पर एक खरोंच तक नहीं आई।
"अरे! यह पत्थर तो बहुत सख्त है... इस पर तो निशान भी नहीं पड़ा!" रुद्र ने माथे पर शिकन के साथ खुद से कहा, "हम्म, शायद रफ़्तार कम रह गई। फिर से..."
"खन्न..."
तलवार निकली! और वापस म्यान में!
रुद्र की हरकतें पानी की तरह तरल और बिना किसी रुकावट के थीं, लेकिन नतीजा वही रहा। पत्थर से सिर्फ़ थोड़ी धूल ही उड़ी।
दिव्य-शक्ति मठ के तीसरे सबसे ऊँचे मुख्य शिखर पर स्थित यह 'नव-मेघ गर्जना' स्थल, हवा में लटके रास्तों से बाकी चोटियों से जुड़ा हुआ था। यहाँ से मीलों दूर तक का नज़ारा देखा जा सकता था। बादलों की परतें बेहद विशाल और मनमोहक थीं।
लेकिन रुद्र का ध्यान इन नज़ारों पर नहीं था। उसका पूरा अस्तित्व 'तेरह वज्र तलवारें' के पहले पैंतरे में समा चुका था।
तलवार निकालना... और वापस रखना...
फिर से निकालना... फिर से रखना...
उसे नहीं पता था कि उसने यह हरकत कितनी बार दोहराई। उसके माथे से पसीना बहकर टपकने लगा था।
"डिंग..."
एक और वार, और इस बार आखिरकार सामने वाले पत्थर पर तलवार का एक छोटा सा निशान उभर आया।
"बढ़िया, बहुत बढ़िया! इसका असर बिल्कुल मेरे 'अष्ट-दिशा प्रहार' जैसा ही है..." रुद्र के चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ गई। उसने तुरंत अपने दिमाग को शांत किया और उसकी नज़रें और भी पैनी हो गईं।
पाँच दिन बीत चुके थे। सूरज और चाँद ने छह बार अपनी जगह बदली। अब रुद्र के सामने वाला परीक्षण-पत्थर अनगिनत तलवार के निशानों से भर चुका था। निशान गहरे और एक-दूसरे में उलझे हुए थे।
'तेरह वज्र तलवारें' के पहले पैंतरे का सार सिर्फ़ एक शब्द में था: रफ़्तार!
अत्यधिक रफ़्तार, जो हर बाधा को तोड़ दे। म्यान से तलवार निकालते ही सबसे शक्तिशाली वार करना, एक ही झटके में काम तमाम करना, बिना किसी हिचकिचाहट और बिना पीछे मुड़े...
"सन्न..."
"कड़ाक..."
हवा को चीरती हुई तलवार की एक अलग ही आवाज़ गूँजी। रुद्र का यह वार पिछले सभी वारों से अलग था।
जैसे ही तलवार पत्थर से टकराई, उसने उस सख्त चट्टान पर एक फुट लंबी और एक इंच गहरी दरार बना दी।
उसके हाथ में थमी तलवार गुनगुना उठी। रुद्र मुस्कुराया, "अब आजमाने का वक़्त आ गया है!"
वह घूमा और चबूतरे पर खड़े उन नौ बिजली के खंभों का सामना करने लगा। खंभों में बिजली कड़क रही थी और बादलों की गरज सुनाई दे रही थी। बीच में तैर रही नीली तलवार ने जैसे रुद्र के युद्ध-भाव को महसूस कर लिया और उसमें से एक कंपन पैदा हुआ।
रुद्र के शरीर में प्राण-ऊर्जा तेज़ी से दौड़ने लगी। उसके पीछे उसकी 'श्वेत-बाघ आत्मा-शक्ति' जागी और उसके सिर के ऊपर एक विशाल बाघ की आकृति उभर आई। बाघ की सुनहरी आँखें सीधे उन बिजली के खंभों को घूर रही थीं और वह आसमान की ओर मुँह करके दहाड़ रहा था।
"विद्युत-वार..."
रुद्र की आँखों की पुतलियाँ सिकुड़ीं और वह हरकत में आया। तलवार के एक वार के साथ, श्वेत-बाघ की शक्ति से लदी सफेद तलवार-ऊर्जा सीधे सबसे नज़दीकी बिजली के खंभे पर जा गिरी।
"सन्न..."
हवा के फटने की आवाज़ आई। वह सफेद ऊर्जा उस बिजली के खंभे में गहराई तक समा गई...
लेकिन जैसे समुद्र में पत्थर फेंका गया हो, वह ऊर्जा बिना किसी निशान के गायब हो गई।
रुद्र अभी हैरान हो ही रहा था कि अचानक वह बिजली का खंभा हिलने लगा और उसमें से एक नीली तलवार-ऊर्जा निकली, जो सीधे रुद्र की ओर गोली की रफ़्तार से आई...
पलक झपकते ही रुद्र ने अपनी तलवार खींची और बिना किसी झिझक के वार किया। उसके शरीर से निकली सफेद ऊर्जा उस नीली ऊर्जा से जा टकराई।
"ची... ची... ची..."
नीली और सफेद ऊर्जाएँ रुद्र के ठीक सामने टकराकर फट गईं। अनगिनत छोटी-छोटी ऊर्जा की किरणें चारों तरफ बिखरीं, जिनमें से कई रुद्र के कानों और कपड़ों को छूती हुई निकल गईं, जिससे उसकी त्वचा पर खून की लकीरें बन गईं और कपड़े फट गए...
"इतनी ताकत..."
"मैंने सोचा नहीं था कि इस पैंतरे को साधने के बाद भी मैं इस खंभे के एक वार का मुकाबला नहीं कर पाऊँगा... क्या यह 'नव-मेघ गर्जना' सच में अजेय है?"
रुद्र की भौहें तन गईं। उसकी आँखों में एक पल के लिए हिचकिचाहट दिखी।
"नहीं... ऐसा नहीं हो सकता। अगर यह एक परीक्षा है, तो इसे तोड़ने का कोई न कोई तरीका ज़रूर होगा। फिर से..."
जैसे ही यह विचार उसके मन में आया, रुद्र की नज़रें फिर से जम गईं। उसने बिना किसी डर के तलवार निकाली और खंभे पर वार कर दिया।
जब खंभे ने जवाबी हमला किया, तो रुद्र ने, जो पहले से तैयार था, उसे काटने के लिए अपनी तलवार घुमा दी...
यह सिलसिला बार-बार चलता रहा। चबूतरे पर तलवारों की परछाइयाँ और ऊर्जा की चमक हर तरफ फैल गई।
रुद्र नहीं जानता था कि उसने कितनी बार तलवार चलाई। उसके कपड़े पूरी तरह तार-तार हो चुके थे और शरीर पर अनगिनत घाव थे। हर घाव से खून रिस रहा था। हालाँकि घाव गहरे नहीं थे, लेकिन उनकी तादाद इतनी ज़्यादा थी कि रुद्र खून से नहाया हुआ किसी पागल जैसा लग रहा था।
उसने दूसरे खंभों पर भी हमला करके देखा, लेकिन नतीजा वही रहा।
इसके बाद, रुद्र ने अपना दिमाग पूरी तरह शांत कर लिया। उसका पूरा ध्यान सिर्फ़ तलवार चलाने, हमला करने और बचाव करने पर था। वह तलवार की दुनिया में पूरी तरह डूब चुका था। हर वार और हर बचाव के साथ, तलवार के प्रति उसकी समझ गहरी होती जा रही थी।
खासकर उस खंभे से निकलने वाली नीली ऊर्जा ने उसे चौंका दिया था—कभी तेज़, कभी धीमी, कभी ठोस, कभी धुएं जैसी। उसका कोई निश्चित रूप नहीं था।
"तो यह बात है। जैसे पानी का कोई रूप नहीं होता, वैसे ही तलवार का भी कोई निश्चित आकार नहीं होता। तलवार दिल से पैदा होती है और दिल से ही चलती है! यही असली तलवार है..."
रुद्र की आँखों में एक शून्यता थी। वह अपनी ओर आती उस नीली ऊर्जा को देख रहा था। धीरे-धीरे, उसे वह तेज़ रफ़्तार ऊर्जा धीमी होती दिखाई देने लगी, इतनी धीमी जैसे वह रुकने वाली हो।
"विद्युत-वार..."
तभी रुद्र के शरीर से एक तेज़ सफेद रौशनी फूटी। साथ ही उसकी 'श्वेत-बाघ आत्मा-शक्ति' ने भी एक चमक छोड़ी जो उसकी तलवार की धार में समा गई। उसने पूरी ताकत से उस नीली ऊर्जा पर वार किया...
"डिंग..."
एक करारी आवाज़ के साथ, वह नीली ऊर्जा दो टुकड़ों में कट गई। रुद्र की सफेद ऊर्जा उसे चीरती हुई आगे बढ़ी और सीधे बिजली के खंभे से जा टकराई।
"ओम..."
ऊर्जा के टकराते ही खंभा थरथरा उठा। बादलों की धीमी गड़गड़ाहट के बीच, खंभे में ठीक उसी जगह एक छोटा सा छेद हो गया जहाँ रुद्र का वार लगा था। जैसे उस वार ने खंभे को आर-पार बेध दिया हो।
हालाँकि अगले ही पल वह छेद भर गया और खंभा पहले जैसा हो गया, और तुरंत एक और नीली ऊर्जा रुद्र की तरफ लपकी।
"हाँ... यही है वो!"
रुद्र के होंठों पर एक हल्की, विजयी मुस्कान तैर गई।
दिव्य-शक्ति मठ के विशाल 'शून्य-शिखर मंच' पर शिष्यों का भारी हुजूम जमा था। सभी एक ही रंग की पोशाक पहने हुए थे और उनके चेहरों पर गहरी गंभीरता छायी थी।
भीड़ में अचानक सुगबुगाहट शुरू हो गई।
"क्या बात है? आज भीतरी मठ के बड़े-बड़े आचार्य भी यहाँ इंतज़ार में खड़े हैं?"
"सुना है कि मठ का सबसे होनहार शिष्य, नील, सूर्य-तेज मठ से मुकाबला जीतकर लौट रहा है!"
"क्या? नील? रायगढ़ का वो जीनियस जिसने सिर्फ दस साल की उम्र में सात-सितारा आत्मा-शक्ति जगा ली थी और सोलह साल का होते-होते देह-शुद्धि स्तर के सातवें चरण तक पहुँच गया?"
"हाँ, वही। खबर है कि हमारे मठ के कई और प्रतिभाशाली शिष्य भी उसके साथ गए थे और सबने शानदार जीत हासिल की है। इसीलिए खुद आचार्य उनके स्वागत के लिए आए हैं।"
भीड़ में दबी ज़बान में बातें हो रही थीं, लेकिन जैसे ही 'नील' का नाम लिया जाता, लोगों की साँसें थम सी जातीं। उसकी ख्याति सचमुच आसमान छू रही थी।
सबसे आगे भीतरी मठ के तीन मुख्य आचार्य खड़े थे। उनके पीछे उनके अपने शिष्य थे, जो खुद भी दिव्य-शक्ति मठ के जाने-माने चेहरे थे।
तभी दूर क्षितिज पर, बादलों को चीरता हुआ एक विशाल पक्षी उड़ता हुआ दिखाई दिया। उसकी रफ़्तार इतनी तेज़ थी कि पलक झपकते ही वह नज़दीक आ गया। उसकी पीठ पर दर्जन भर आकृतियाँ धुँधली सी नज़र आ रही थीं।
"वे आ गए!"
भीतरी मठ के प्रधान आचार्य ने अपनी आँखें सिकोड़कर आसमान की ओर देखा।
वह कोई साधारण पक्षी नहीं, बल्कि एक खूंखार शिकारी जानवर था। उसके पंखों का फैलाव दस मीटर से भी ज़्यादा था। नुकीली चोंच, तेज़ पंजे और भेदने वाली आँखें। एक हरी रोशनी ने उसकी पीठ पर बैठे लोगों को घेर रखा था। देखते ही देखते वह शून्य-शिखर मंच की ओर गोता लगाने लगा।
पक्षी के ज़मीन पर उतरते ही, पीछे से एक भारी और रौबदार आवाज़ गूँजी।
"इतनी देर इंतज़ार करने के लिए क्षमा करें, आचार्यों।"
यह आवाज़ बैंगनी कपड़े पहने एक युवक की थी। तलवार जैसी भौहें, शेर जैसी आँखें और चौड़ा माथा। उसके चेहरे पर बेबाकी और आत्मविश्वास साफ झलक रहा था। यह मठ के कार्यकारी आचार्यों में से एक, आचार्य लोकेश थे, जो 'चरम युद्ध भवन' के प्रभारी थे।
पक्षी से एक-एक करके कई आकृतियाँ नीचे कूदीं। सबसे आखिर में एक बैंगनी कपड़ों वाला युवक नीचे उतरा। ज़मीन पर पैर रखते ही उसने अपना हाथ हवा में लहराया, और वह विशाल पक्षी, जिसे सब देख रहे थे, रोशनी बनकर सीधा उसके शरीर में समा गया।
भीड़ में शोर मच गया।
"अरे बाप रे! यह तो उसकी आत्मा-शक्ति थी! क्या यही वो महान जीनियस नील है?"
"बिल्कुल, यह वही है! तुमने देखा नहीं? वह सात-सितारा आत्मा-शक्ति थी—अग्नि-वज्र गरुड़! यह एक दुर्लभ म्यूटेटेड शक्ति है, जिसमें आग के साथ-साथ बिजली की ताक़त भी मिली हुई है!"
भले ही शिष्य धीरे बात कर रहे थे, लेकिन अपनी शक्तियों के कारण आचार्यों को सब कुछ साफ़ सुनाई दे रहा था। दिव्य-शक्ति मठ के तीन मुख्य आचार्यों के माथे पर हल्की शिकन आ गई, लेकिन आचार्य लोकेश का चेहरा गर्व से चमक रहा था।
"इस बार दोनों मठों के बीच हुए नए शिष्यों के मुकाबले में, आचार्य लोकेश जीत का परचम लहराकर लौटे हैं। सच में, उन्होंने दिव्य-शक्ति मठ का मान बढ़ा दिया!"
ये तीनों आचार्य मंझे हुए खिलाड़ी थे। एक ही पल में उन्होंने अपने चेहरे के भाव बदले और मुस्कुराते हुए आचार्य लोकेश का स्वागत किया।
"आप बहुत दयालु हैं," आचार्य लोकेश ने शिष्टाचार निभाते हुए अपने पीछे खड़े युवक की ओर इशारा किया, "नील, आगे आओ और दिव्य-शक्ति मठ के वरिष्ठ आचार्यों का आशीर्वाद लो!"
"शिष्य नील का आचार्यों को प्रणाम!"
नील के होठों पर एक हल्की मुस्कान थी और उसकी आँखों में गजब की चंचलता। उसके शरीर से एक मज़बूत और शुद्ध प्राण-ऊर्जा निकल रही थी, लेकिन उसकी आँखों में छिपा घमंड किसी से छिप नहीं सकता था।
"बहुत बढ़िया! अद्भुत प्रतिभा!" तीनों आचार्यों ने एक साथ सिर हिलाया। वे इस जीनियस से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके।
इसके बाद, बाकी शिष्यों ने भी आगे आकर प्रणाम किया।
"महेन्द्र... प्रताप... नैना... आचार्यों को प्रणाम!"
हर शिष्य के परिचय के साथ आचार्यों के चेहरे पर हैरानी बढ़ती गई। समझौते के मुताबिक, यह मुकाबला उन शिष्यों के लिए था जो पिछले पाँच सालों में मठ में शामिल हुए थे। इसका मतलब था कि इन दर्जन भर शिष्यों में से हर एक के पास कम से कम पाँच-सितारा आत्मा-शक्ति थी। पिछली पीढ़ियों के मुकाबले इनका हुनर कहीं ज़्यादा था। अगर ये शिष्य सही से तैयार हुए, तो वो दिन दूर नहीं जब दिव्य-शक्ति मठ अपने प्रतिद्वंद्वी सूर्य-तेज मठ को पीछे छोड़ देगा।
भीतरी मठ के प्रधान आचार्य हँसे, "बहुत अच्छे! तुम सब बेमिसाल हो, तुम्हारा भविष्य उज्ज्वल है। चलो, अब मुख्य भवन की ओर चलते हैं... कुलपति तुम सबका इंतज़ार कर रहे हैं।"
तभी नील ने अचानक टोकते हुए पूछा, "माफ़ कीजिए, क्या बाहरी मठ में 'रुद्र' नाम का कोई शिष्य है?"
आचार्य और बाकी लोग मुड़ने ही वाले थे कि यह सवाल सुनकर रुक गए।
"यह... मुझे लगता है, शायद है!" भीतरी मठ के आचार्यों को बाहरी शिष्यों के बारे में ज़्यादा जानकारी नहीं थी, लेकिन 'रुद्र' नाम उन्हें कुछ जाना-पहचाना लगा।
नील ने अपनी बात जारी रखी, "मैंने सुना है कि बाहरी मठ में रुद्र नाम का एक बेहद प्रतिभाशाली शिष्य है। मैं उससे दो-दो हाथ करना चाहता हूँ।"
नील ने यह कहते हुए भीड़ पर अपनी नज़र दौड़ाई, जैसे वह किसी को खोज रहा हो। लेकिन उसकी बात खत्म होते ही भीड़ में अचानक हँसी का धमाका हुआ।
"हा हा हा हा..."
"अरे हाँ, बिल्कुल है! बाहरी मठ का वो शिष्य जिसे सब 'महा-नकारा' कहते हैं! वो और प्रतिभाशाली? तुम मज़ाक कर रहे हो..."
"तीन साल हो गए, वो अपनी आत्मा-शक्ति तक नहीं जगा पाया, और तुम उसे टैलेंटेड कह रहे हो? हद है, उसकी बदनामी तो अब नील तक भी पहुँच गई..."
"सही कहा, यह तो बेइज्जती है। मुझे लगता है बाहरी मठ की परीक्षा का इंतज़ार किए बिना उसे सीधे मठ से बाहर निकाल देना चाहिए..."
दिव्य-शक्ति मठ के तीनों बड़े आचार्य गंभीर स्वभाव के थे, लेकिन वे भी यह सुनकर झेंप गए और उन्होंने मन ही मन रुद्र का नाम नोट कर लिया।
जैसे-जैसे भीड़ का मज़ाक बढ़ता गया, नील की आँखों में एक शरारती चमक आ गई। उसने कनखियों से अपने बगल में खड़ी बैंगनी कपड़ों वाली लड़की को देखा।
यह लड़की नैना थी।
उसका चेहरा पहले ही शांत था, लेकिन भीड़ की हँसी और मज़ाक सुनकर वह एकदम ठंडी पड़ गई। उसकी आँखों में गुस्सा कौन गया। जब उसकी नज़र नील से मिली, तो वह समझ गई—नील ने यह सब जानबूझकर किया था। उसने सबके सामने रुद्र को ज़लील करने का यह नाटक रचा था।
"चलो, अब मुख्य भवन चलते हैं। कुलपति को इंतज़ार कराना ठीक नहीं..." आचार्य लोकेश ने बाकी आचार्यों को नज़रअंदाज़ किया और सीधे मठ के अंदर की ओर बढ़ गए। उनका यह रवैया देखकर बाकी आचार्यों के चेहरे उतर गए। सिर्फ एक होनहार शिष्य क्या मिल गया, लोकेश तो सबको भूल ही गए।
कुछ ही देर बाद, सभी लोग मठ के मुख्य भवन के द्वार पर पहुँच गए।
वहाँ पहले से ही कुछ लोग इंतज़ार कर रहे थे। सबसे आगे खड़े थे दिव्य-शक्ति मठ के कुलपति, मोहन!
आचार्य लोकेश ने गर्व से नील की ओर देखा और कुलपति मोहन की तरफ कदम बढ़ाए। वे कुछ बोलने ही वाले थे कि अचानक एक अनहोनी घटी।
धड़ाम... गड़गड़ाहट...
जैसे सदियों से दबी हुई कोई प्राचीन बिजली आज अचानक फट पड़ी हो। एक ऐसी भीषण गर्जना हुई कि पूरा दिव्य-शक्ति मठ हिल गया। यह आवाज़ आसमान से नहीं, ज़मीन के किसी हिस्से से गूँज रही थी।
इस बिजली में इतनी ताक़त थी कि वहाँ मौजूद हर व्यक्ति सन्न रह गया।
धड़ाम... गड़गड़ाहट...
दूसरी बार फिर वही धमाका हुआ। इस बार सबके दिलों में दहशत बैठ गई।
साधारण शिष्य घबरा गए क्योंकि यह कोई आम आकाशीय बिजली नहीं थी। इसकी गूँज से उनके शरीर की प्राण-ऊर्जा हिलोरें लेने लगी थी। इसमें प्रकृति की वो शक्ति थी जो किसी इंसान के बस की बात नहीं। बिना किसी वजह के मठ के अंदर ऐसी आसमानी बिजली क्यों गिर रही थी?
लेकिन, मठ के आचार्यों और कुलपति मोहन के चेहरे का रंग पूरी तरह उड़ चुका था। वे जानते थे कि यह आवाज़ कहाँ से आ रही है।
"स्वर्ण शिखर पर कौन है!"
कुलपति मोहन की आँखें चमक उठीं और उन्होंने ज़ोर से दहाड़ लगाई।
धड़ाम... गड़गड़ाहट...
जैसे ही तीसरी बिजली कड़की, कुलपति मोहन का शरीर एक रोशनी की लकीर में बदल गया और वे सीधे 'स्वर्ण शिखर' के प्रवेश द्वार की ओर दौड़ पड़े।
दशकों से, तीन बार तो छोड़ो, कोई एक बार भी उस आसमानी बिजली को हिला नहीं पाया था।
लगातार हो रहे इन धमाकों का सिर्फ एक ही मतलब था—मठ के किसी अकल्पनीय जीनियस ने 'नव-मेघ गर्जना' की परीक्षा पास कर ली थी और लगातार तीन बिजली के स्तंभों को तोड़ दिया था।
यह प्रतिभा पिछले सौ सालों में दिव्य-शक्ति मठ में पहली बार देखने को मिल रही थी।