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Chapter 13

Dangerous obsession of love - Chapter 13

Dangerous obsession of love

होटल में हुए एक्सीडेंट में सबका रेस्क्यू करने के बाद अमन वहां से बाहर जा ही रहा था कि तभी उसकी नजर आंशी पर पड़ी जो एक टेबल के पास बेहोश पड़ी थी।

“ओ माय गुडनेस। ये मेरी नजरों से कैसे रह गई।” अमन दौड़कर आंशी के पास गया। उसने आंशी का चेहरा देखा। “अरे ये तो वही चिल्लाने वाली लड़की है। हमेशा मुझे इस हाल में ही क्यों मिलती है कि इससे कुछ पूछ भी नहीं पाता। कहीं इसकी तरह कोई और तो मेरी नजरों से रह नहीं गया।”

अमन ने जल्दी से इधर उधर नजर दौड़ाई। वहां पर आंशी के अलावा और कोई नहीं था। उसने आंशी को अपनी गोद में उठाया। बाहर निकलते वक्त उसने अपने चेहरे पर मास्क फिर से लगा लिया था।

“चलो, तुम्हें फिर से बचाया जाए, चिल्लाने वाली लड़की।” अमन आंशी को लेकर बाहर आया।

“अंदर आग लगी है।“ आंशी बेहोशी में बड़बड़ा रही थी। उसने अपनी आंखें खोलने की कोशिश की, तो उसे सब धुंधला सा नजर आ रहा था।

अमन उसे एक एंबुलेंस के पास लेकर गया और वहां स्ट्रेचर पर लिटा दिया। “आग लगने की वजह से ये पैनिक हो गई थी। देख लीजिए, इसे कोई मेजर इंजरीज तो नहीं आई है।” अमन ने वहां मौजूद नर्स से कहा।

इसके बाद वो वहां से जा चुका था। अमन आर्टिस्टिक के ऑफिस जाने के बजाए अपने हेडक्वार्टर्स गया था।

उसके जाने के कुछ देर बाद आंशी को होश आ गया था। “मुझे यहां कौन लेकर आया?” आंशी ने नर्स से पूछा।

“मैं नही जानती मैम, उन्होंने मास्क पहना था।” नर्स ने जवाब दिया।

आंशी अपनी याददाश्त पर जोर डालकर सोचने लगी। उसे कुछ याद नहीं आ रहा था, बस अमन का धुंधला सा चेहरा उसकी आंखों के सामने तैरने लगा।

“फिर वही आंखें। कौन हो तुम? तुम कोई आम इंसान नहीं हो सकते। उस दिन भी मैंने तुम्हारी कुछ बातें सुनी थी तुम। तुम और तुम्हारी टीम वहां पर बॉम्ब डिफ्यूज करने के लिए आई थी।” आंशी ने अपने मन में सोचा।

नर्स ने आंशी को कुछ दवाइयां दी जिन्हें लेने के बाद उसे थोड़ा बेहतर महसूस हो रहा था। आंशी ने वहां से ऑटो किया और अपने घर आ गई।

प्रीतो जी इस हादसे से अनजान थी। उन्होंने देखा कि आंशी के कपड़े थोड़े काले पड़ गए थे और चेहरा भी मुरझाया हुआ था।

“कि होया कुड़िए। ऐसे शक्ल पर 12:00 क्यों बजा रखे हैं? जब मैंने बोल दिया है कि तेरे पापा को मैं देख लूंगी। फिर मुंह लटकाने की क्या जरूरत है?” प्रीतो जी ने पूछा।

आंशी अब तक उस मास्क वाले लड़के के बारे में सोच रही थी। जैसे ही प्रीतो जी के मुंह से उसके पापा के आने की बात सुनी तो उसने हल्के से अपने सिर पर मारा और कहा, “उस लड़के के चक्कर में मैं तो सब कुछ भूल ही गई थी।”

“कौन सा लड़का?” प्रीतो जी ने आंखें दिखा कर पूछा।

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“कोई भी नहीं दादी। और अब आपको पापा की फिक्र करने की जरूरत नहीं है। मैंने उसका रास्ता भी ढूंढ लिया है।” आंशी ने जवाब दिया।

“कहीं तु कुछ उल्टा सीधा करने का तो नहीं सोच रही? आंशी तू अपने पापा को अच्छे से जानती है।” प्रीतो जी ने उसे आंखें दिखाते हुए पूछा।

“हां दादी अच्छे से जानती हूं। इतने अच्छे से कि पिछले 10 सालों से मैंने उनकी शक्ल तक नहीं देखी है।” आंशी ने गुस्से में कहा।

“वो तुमसे मिलने के लिए लंदन जाना चाहता था लेकिन कामकाज के चक्कर में उसे वक्त ही नहीं मिल पाया।” प्रीतो जी ने सफाई दी।

“बस भी कीजिए दादी। आप थकते नहीं है क्या उनका पक्ष लेते लेते। वो लंदन नहीं आ सकते थे तो क्या हुआ? मुझे तो यहां बुला सकते थे ना? खैर छोड़िए, मुझे ये सब बातें करके अपना मूड ऑफ नहीं करना। मैं भी उन्हीं की बेटी हूं। अब वो मुझे इंडिया से निकाल कर दिखाएं।” आंशी ने कहा। उसके बाद सीधे वो अपने कमरे में चली गई।

लंदन छोड़ते वक्त आंशी अपना सारा सामान लेकर आ चुकी थी। वो आते वक्त ये सोच कर आई थी कि वापस कभी लंदन नहीं जाएगी।

आंशी ने एक बैग से अपने डाक्यूमेंट्स निकाले और उसे अच्छे से संभाल कर सीवी बनाने लगी। अपना काम खत्म करने के बाद वो नहाने चली गई। बाहर आई तो उसने देखा शाम के 4:00 बज रहे थे।

“कल शाम तक डैड यहां आ जाएंगे। मेरे पास ज्यादा टाइम नहीं है। मुझे वैकेंसी ढूंढनी होगी।” आंशी ने अपना लैपटॉप उठाया और उसमें वैकेंसीज ढूंढने लगी।

“कुछ भी खास नहीं मिल पा रहा।” आंशी ने खुद से कहा। “जिन भी कंपनीज में वैकेंसी मौजूद है, वो सब इतनी बड़ी कंपनी नहीं है कि उन्हें किसी एंप्लॉय के जाने का फर्क पड़े। ऊपर से मेरे पास ज्यादा डिग्रीज भी नहीं है। लगता है मुझे बिना पूंछ वाले बंदर के आने का ही इंतजार करना पड़ेगा।” आंशी ने खुद से कहा।

थक हार कर आंशी ने लैपटॉप बंद कर दिया और लेट गई। उसकी आंखों के सामने अभी भी अमन का चेहरा घूम रहा था जो की धुंधला था।

“कौन हो तुम। तुम्हारी आंखें। तुम्हारी आंखें मेरे दिमाग में बस सी गई है। लेकिन जब भी मिलते हो मैं ऐसी सिचुएशन में होती हूं कि तुमसे कुछ पूछने का मौका ही नहीं मिलता। तुम जो भी हो ये तो तय है कि तुम एक स्पाई हो। और मैं तुम्हें ढूंढ कर रहूंगी।” सोचते सोचते आंशी को वहीं पर नींद आ गई।

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होटल में रेस्क्यू ऑपरेशन हैंडल करने के बाद अमन हेड क्वार्टर्स पहुंचा। ये एक सीक्रेट एजेंसी का हेड क्वार्टर था जो कि दिखने में बिल्कुल भी सामान्य नहीं था। उनका काम दुनिया की नजरों से छुपा होता था तो वहीं उनका ऑफिस भी लोगों की सोच से परे था।

सिक्योरिटी एजेंसी का ऑफिस चंडीगढ़ के एक हांटेड हाउस के बेसमेंट में बनाया गया था। हांटेड हाउस के अंदर ऐसी जगह भी मौजूद हो सकती है, कोई उसके बारे में सोच भी नहीं सकता था।

अंदर जाने के बाद अमन वहां के चीफ के ऑफिस में गया जो कि लगभग 55 साल का एक आदमी था। उसके बाल ग्रे थे और चेहरे पर गहरी दाढ़ी थी। उसकी टेबल पर उस की नेमप्लेट पड़ी थी जिस पर उसका नाम लिखा था, 'तेज प्रकाश दत्त'। अंदर आते ही अमन ने उसे सलूट किया।

“रेस्टोरेंट में हुए हादसे के बारे में मुझे पता चला। आई रियली अप्रिशिएट यू, तुमने वहां मौजूद लोगों की जान बचाई।” मिस्टर दत्त ने गंभीर आवाज में कहा।

“थैंक यू सर।” अमन ने बिल्कुल सधे लहजे में जवाब दिया।

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“मैं जानता हूं अमन तुम अपने काम में परफेक्ट हो और चीजें बहुत अच्छे से हैंडल करते हो, लेकिन फेयर में हुए धमाके में वो आदमी भाग निकला। तुम्हें पुख्ता खबर मिली थी उसके बावजूद वो आदमी तुम्हारे हाथ से कैसे जा सकता है?” मिस्टर दत्त ने कहा।

“ये हमारी ही नाकामयाबी थी सर!” अमन ने सीधा सीधा सारा ब्लेम खुद पर लिया।

“लेकिन मैंने मिस्टर गुप्ता के मुंह से तो कुछ और ही सुना था। वो बता रहे थे कि वहां पर एक लड़की मौजूद थी, जिसने चिल्लाकर भीड़ इकट्ठा कर ली थी और भगदड़ मचने की वजह से सारा प्लान बिगड़ गया। मौके का फायदा उठाकर वो आदमी वहां से भाग गया।” मिस्टर दत्त ने कहा।

“मिशन हम हैंडल कर रहे थे ना कि वो लड़की। एक आम इंसान बॉम्ब को देखकर उसी तरह रिएक्ट करता है और कोशिश करता है कि वहां मौजूद लोगों की जान बचाई जा सके। उस लड़की ने भी वही किया।” अमन ने आंशी का पक्ष लेते हुए कहा।

“फिलहाल के लिए मैंने बात को संभाल लिया है। आई होप कि आगे से मुझे तुम्हारी तरफ से नाकामयाबी की खबर ना मिले। ये मिशन बहुत बड़ा है और शहर में हो रहे ब्लास्ट्स उसका हिस्सा... ध्यान रहे आगे लापरवाही ना हो।” मिस्टर दत्त ने सख्त लहजे में कहा।

“यस सर।” अमन ने सधे लहजे में कहा और उसे सलूट करके उसके केबिन से बाहर आ गया।

बाहर उसी की तरह और भी ऑफिसर्स मौजूद थे। सब ने उसका अच्छे से ग्रीट किया। उसकी एक कलीग दिव्याना बजाज उसके पास आई। वो लगभग 26 साल के करीब थी और दिखने में बहुत ही खूबसूरत थी। गोरा मासूम चेहरा, भूरी आंखें और कमर तक लंबे बाल।

“हेलो मिस्टर कपूर। सुना है बॉम्ब प्लांट करने वाला मुजरिम भाग गया है।” दिव्याना ने अमन के पास आकर टौंट मारा।

“ये सिक्योरिटी एजेंसी का ऑफिस है मिस बजाज... कोई न्यूज़ चैनल नहीं जो आप सुनी सुनाई बातों को लेकर मुझे टोंट मार रही है। यहां सब को पता है कि वो आदमी भाग गया था। फिर आकर मुझसे पूछने का मतलब?” अमन ने गुस्से में कहा।

“मतलब ये कि तुम अपनी टीम में उस यूज़लेस जस और लावण्या के बजाय मुझे लेते, तो शायद तुम्हारी तरफ से नाकामयाबी की खबर नहीं आती।” दिव्याना ने भौंहें उठाकर कहा।

उसकी बात सुनकर अमन ने कुछ देर सोचा। उसने दिव्याना बजाज की तरफ देखा। दिव्याना दिखने में काफी खूबसूरत और मासूम लगती थी।

कुछ देर सोचने के बाद उसने कहा, “अभी भी कहां देर हुई है?”

“मतलब? क्या तुम सच में मुझे अपनी टीम में लेने के लिए रेडी हो?” दिव्याना ने हैरानी से पूछा।

“ऑफ कॉर्स यस।” अमन ने उसकी बात पर हामी भरी और फिर से अपने कदम तेज प्रकाश दत्त के ऑफिस की तरफ बढ़ा दिए।

दिव्याना उसके इस रवैए से हैरान थी। “अचानक अमन ने हां क्यों कह दी? हमारे बीच इतना सब कुछ हुआ था उसके बाद तो इसे मेरी शक्ल तक से नफरत थी। फिर हां कहने की क्या वजह हो सकती हैं?”

अमन के मन में क्या चल रहा था इस बात का पता लगाने के लिए दिव्याना भी उसके पीछे तेज प्रकाश दत्त के ऑफिस में गई, ताकि उनके बीच की बातचीत को सुन सके।

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